Friday, September 21, 2012

श्रीमन् नारायणीम् - दशक - ७




श्रीमन् नारायणीम्  *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - ७

एवं देव चतुर्दशात्मकजगद्रूपेण जात: पुन-
स्तस्योर्ध्वं खलु सत्यलोकनिलये जातोऽसि धाता स्वयम् ।
यं शंसन्ति हिरण्यगर्भमखिलत्रैलोक्यजीवात्मकं
योऽभूत् स्फीतरजोविकारविकसन्नानासिसृक्षारस: ॥१॥
 

हे देव! इस प्रकार से चौदह प्रकार के जगदात्मक स्वरूप से पैदा हो कर फिर आप
उसके ऊपर सत्यलोक के निवास में स्वयं ब्रह्मा रूप से आविर्भूत हुए, जिसे
हिरण्यगर्भ कहते हैं। अशेष त्रैलोक्य के जीवात्मक स्वरूप, उद्भूत रजोगुण से
बढी हुई नाना प्रकार की सृष्टि की रचना करने की इच्छा वाले बने।



सोऽयं विश्वविसर्गदत्तहृदय: सम्पश्यमान: स्वयं
बोधं खल्वनवाप्य विश्वविषयं चिन्ताकुलस्तस्थिवान् ।
तावत्त्वं जगतां पते तप तपेत्येवं हि वैहायसीं
वाणीमेनमशिश्रव: श्रुतिसुखां कुर्वंस्तप:प्रेरणाम् ॥२॥
 

हे जगदीश्वर! वही ब्रह्मा विश्व की सृष्टि रचना में दत्त चित्त हो कर स्वयं ही
विचार करने की चेष्टा करने लगे, किन्तु रचना के विषय में कुछ भी ज्ञान नहीं
प्राप्त कर पाए, अतएव चिन्ताकुल हो कर निश्चेष्ट हो कर बैठ गये। तब आपने उनको
'तप तप' इस प्रकार आकाशवाणी सुनाई, जो सुनने में सुख देने वाली थी और तप करने
की प्रेरणा दे रही थी।



कोऽसौ मामवदत् पुमानिति जलापूर्णे जगन्मण्डले
दिक्षूद्वीक्ष्य किमप्यनीक्षितवता वाक्यार्थमुत्पश्यता ।
दिव्यं वर्षसहस्रमात्ततपसा तेन त्वमाराधित -
स्तस्मै दर्शितवानसि स्वनिलयं वैकुण्ठमेकाद्भुतम् ॥३॥
 

ब्रह्मा जी ने चारों ओर देखा यह जानने के लिये कि कहां से और किस पुरुष की
आवाज आई है। किन्तु जल प्लावित जगत मण्डल के अतिरिक्त कुछ भी नहीं देख पाए।
फिर उन्होंने वाक्य की गम्भीरता पर विचार करके एक सहस्र दिव्य वर्षों तक
तपस्या की। उस तपस्या से आपकी ही आराधना की गई थी। तब आपने ब्रह्मा जी को अपना
अद्वितीय अद्भुत निवास स्थान वैकुण्ठ दिखाया।


माया यत्र कदापि नो विकुरुते भाते जगद्भ्यो बहि:
शोकक्रोधविमोहसाध्वसमुखा भावास्तु दूरं गता: ।
सान्द्रानन्दझरी च यत्र परमज्योति:प्रकाशात्मके
तत्ते धाम विभावितं विजयते वैकुण्ठरूपं विभो ॥४॥
 

हे विभो! वह वैकुण्ठ धाम माया के विकारों से अप्रभावित है और चौदह भुवनो से
परे देदीप्यमान है। शोक, क्रोध, मोह भय आदि वहां नहीं व्यापते। वहां घनीभूत
आनन्द का निर्झर वहां सदा बहता रहता है और आत्मानुभूति की परम ज्योति वहां सदा
विद्यमान रहती है। ऐसा आपका निवास स्थान जो वैकुण्ठ नाम से जाना जाता है, आपने
ब्रह्मा जी को दिखाया।



यस्मिन्नाम चतुर्भुजा हरिमणिश्यामावदातत्विषो
नानाभूषणरत्नदीपितदिशो राजद्विमानालया: ।
भक्तिप्राप्ततथाविधोन्नतपदा दीव्यन्ति दिव्या जना-
तत्ते धाम निरस्तसर्वशमलं वैकुण्ठरूपं जयेत् ॥५॥
 

जिन दिव्य जनों ने भक्ति से प्राप्त उन्नत पद प्राप्त किया है, वे निश्चय ही
चार भुजाओं वाले हैं, नील मणि के समान श्याम वर्ण वाले हैं, नाना प्रकार के
रत्न जडित आभूषणों से सुसज्जित वे चारों दिशाओं को आलोकित करते हैं। वे
शोभायमान बिमानों के समान घरों में रहते हैं। ऐसे दिव्य जन, सब पापों से रहित
आपके वैकुण्ठधाम में वास करते हैं। हे वैकुण्ठ स्वरूप! आपकी जय हो!



नानादिव्यवधूजनैरभिवृता विद्युल्लतातुल्यया
विश्वोन्मादनहृद्यगात्रलतया विद्योतिताशान्तरा ।
त्वत्पादांबुजसौरभैककुतुकाल्लक्ष्मी: स्वयं लक्ष्यते
यस्मिन् विस्मयनीयदिव्यविभवं तत्ते पदं देहि मे ॥६॥
 

उस वैकुण्ठ में, जिसमें नानाविध दिव्याङ्गनाओं से घिरी हुई, विद्युत लता के
समान विश्व को उन्मादित करने वाली देह लता से दिशाओं को प्रदीप्त करने वाली,
सदा आपके चरणो के सौरभपान के लिये लालायित लक्ष्मी स्वयं देखी जाती है। वह
वैकुण्ठ आश्चर्यजनक वैभव से सम्पन्न है, एवं समस्त पापों से रहित है, ऐसा आपका
परम पद मुझे दीजिये।



तत्रैवं प्रतिदर्शिते निजपदे रत्नासनाध्यासितं
भास्वत्कोटिलसत्किरीटकटकाद्याकल्पदीप्राकृति ।
श्रीवत्साङ्कितमात्तकौस्तुभमणिच्छायारुणं कारणं
विश्वेषां तव रूपमैक्षत विधिस्तत्ते विभो भातु मे ॥७॥
 

हे विभो! वहां, इस प्रकार दिखाये गये आपके पद वैकुण्ठ में ब्रह्मा ने नाना
प्रकार के रत्नो से जडे हुए सिंहासन पर विराजमान, करोडों सूर्य के समान चमकते
हुए मुकुट और नाना प्रकार की आकृति वाले कङ्गन आदि से शोभित, श्रीवत्स से
अङ्कित, तथा कण्ठ में धारण की हुई कौस्तुभ मणि की अरुण छाया से सुसज्जित,
विश्व के कारण स्वरूप, आपके रूप को देखा। वह दिव्य रूप मुझे भी स्पष्ट हो।



कालांभोदकलायकोमलरुचीचक्रेण चक्रं दिशा -
मावृण्वानमुदारमन्दहसितस्यन्दप्रसन्नाननम् ।
राजत्कम्बुगदारिपङ्कजधरश्रीमद्भुजामण्डलं
स्रष्टुस्तुष्टिकरं वपुस्तव विभो मद्रोगमुद्वासयेत् ॥८॥
 

हे विभो! काले बादलों और कोमल कलाय फूलों के समान सुन्दर चक्र से सम्पूर्ण
दिशाओं को आलोकित करने वाला, उदार मन्द हंसी के निर्झर से प्रसन्न मुखमण्डल
वाला, शोभायमान शङ्ख, गदा, चक्र और कमल धारण किये हुए दिव्य भुजाओं वाला,
ब्रह्मा को तुष्टि प्रदान करने वाला आपका वह स्वरूप मेरे रोगों का विनाश करे।



दृष्ट्वा सम्भृतसम्भ्रम: कमलभूस्त्वत्पादपाथोरुहे
हर्षावेशवशंवदो निपतित: प्रीत्या कृतार्थीभवन् ।
जानास्येव मनीषितं मम विभो ज्ञानं तदापादय
द्वैताद्वैतभवत्स्वरूपपरमित्याचष्ट तं त्वां भजे ॥९॥
 

इस अद्भुत रूप के दर्शन करके ब्रह्मा विस्मित और चकित हो कर और हर्ष के आवेश
में आपके चरण कमलों पर गिर पडे। प्रसन्नता से परिपूरित कृतार्थ भाव से बोले
-'हे विभो! आप मेरा मनोरथ जानते ही हैं। द्वैत एवं अद्वैत, आपके परम स्वरूप का
बोध कराने वाला ज्ञान दीजिये' - ब्रह्मा ने इस प्रकार कहा जिनसे, उन आपका मैं
भजन करता हूं।



आताम्रे चरणे विनम्रमथ तं हस्तेन हस्ते स्पृशन्
बोधस्ते भविता न सर्गविधिभिर्बन्धोऽपि सञ्जायते ।
इत्याभाष्य गिरं प्रतोष्य नितरां तच्चित्तगूढ: स्वयं
सृष्टौ तं समुदैरय: स भगवन्नुल्लासयोल्लाघताम् ॥१०॥
 

अपने अरुणाभ चरणों पर पडे हुए विनम्र ब्रह्मा के हाथ को अपने हाथ से स्पर्श
करके आपने कहा कि - 'तुमको सृष्टि की रचना करने का ज्ञान होगा और रचना की
विधियों से कोई बन्धन भी नहीं होगा।' इस प्रकार वाणी कह कर ब्रह्मा को
भलीभांति सन्तुष्ट कर के उनके चित्त में आप गूढ रूप से प्रवेश कर गये और उन्हे
सृष्टि की रचना करने की प्रेरणा दी। वही हे भगवन! आप मेरी निरोगिता का सम्पादन
कीजिये।


 
ॐ नमो नारायणाय नम: ..

No comments:

Post a Comment