श्रीमन् नारायणीम् *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - ९
स्थितस्स कमलोद्भवस्तव हि नाभिपङ्केरुहे
कुत: स्विदिदमम्बुधावुदितमित्यनालोकयन् ।
तदीक्षणकुतूहलात् प्रतिदिशं विवृत्तानन-
श्चतुर्वदनतामगाद्विकसदष्टदृष्ट्यम्बुजाम् ॥१॥
कुत: स्विदिदमम्बुधावुदितमित्यनालोकयन् ।
तदीक्षणकुतूहलात् प्रतिदिशं विवृत्तानन-
श्चतुर्वदनतामगाद्विकसदष्टदृष्ट्यम्बुजाम् ॥१॥
वह कमलभू ब्रह्मा आप ही के नाभि कमल पर स्थित, सोचने लगे कि यह कमल इस एकार्णव
में कहां से उत्पन्न हुआ? यह जानने की जिज्ञासा से उन्होने चारो दिशाओं में
मुंह घुमाया। इससे वे चार मुख वाले हो गये जिनमें आठ नेत्र कमल विकसित हो रहे
थे।
महार्णवविघूर्णितं कमलमेव तत्केवलं
विलोक्य तदुपाश्रयं तव तनुं तु नालोकयन् ।
क एष कमलोदरे महति निस्सहायो ह्यहं
कुत: स्विदिदम्बुजं समजनीति चिन्तामगात् ॥२॥
विलोक्य तदुपाश्रयं तव तनुं तु नालोकयन् ।
क एष कमलोदरे महति निस्सहायो ह्यहं
कुत: स्विदिदम्बुजं समजनीति चिन्तामगात् ॥२॥
उस महार्णव में उस कमल को ही लहराते हुए देख कर और उसके आधारभूत आपके शरीर को
न देख कर, ब्रह्मा चिन्ता में पड गये कि इस महान कमल के उदर में वे अकेले थे
और वह कमल कहां से आया तथा किसने उसे पैदा किया।
अमुष्य हि सरोरुह: किमपि कारणं सम्भ्वे-
दिति स्म कृतनिश्चयस्स खलु नालरन्ध्राध्वना ।
स्वयोगबलविद्यया समवरूढवान् प्रौढधी -
स्त्वदीयमतिमोहनं न तु कलेवरं दृष्टवान् ॥३॥
दिति स्म कृतनिश्चयस्स खलु नालरन्ध्राध्वना ।
स्वयोगबलविद्यया समवरूढवान् प्रौढधी -
स्त्वदीयमतिमोहनं न तु कलेवरं दृष्टवान् ॥३॥
अवश्य ही इस कमल के प्रकट होने का कोई तो कारण होगा' -इस प्रकार निश्चय करके
वे परिपक्व बुद्धि वाले ब्रह्मा अपनी योग विद्या के बल से उस कमल के नाल के
छिद्र से नीचे उतर आये। किन्तु वे आपके अति मनोहर कलेवर को नहीं देख पाये।
तत: सकलनालिकाविवरमार्गगो मार्गयन्
प्रयस्य शतवत्सरं किमपि नैव संदृष्टवान् ।
निवृत्य कमलोदरे सुखनिषण्ण एकाग्रधी:
समाधिबलमादधे भवदनुग्रहैकाग्रही ॥४॥
प्रयस्य शतवत्सरं किमपि नैव संदृष्टवान् ।
निवृत्य कमलोदरे सुखनिषण्ण एकाग्रधी:
समाधिबलमादधे भवदनुग्रहैकाग्रही ॥४॥
तब ब्रह्मा जी ने एक सौ दिव्य वर्ष तक कमल नाल के सभी छिद्रों का प्रयत्न
पूर्वक अन्वेषण किया। किन्तु वे कहीं भी कुछ भी नहीं देख पाये। वे क्मलनाल के
रास्ते से फिर कमल के अन्दर आ कर सुखपूर्वक बैठ गये। फिर उन्होंने एकाग्र
चित्त से एकमात्र आपकी अनुकम्पा के आग्रही हो कर समाधि बल का आश्रय लिया।
शतेन परिवत्सरैर्दृढसमाधिबन्धोल्लसत्-
प्रबोधविशदीकृत: स खलु पद्मिनीसम्भव: ।
अदृष्टचरमद्भुतं तव हि रूपमन्तर्दृशा
व्यचष्ट परितुष्टधीर्भुजगभोगभागाश्रयम् ॥५॥
प्रबोधविशदीकृत: स खलु पद्मिनीसम्भव: ।
अदृष्टचरमद्भुतं तव हि रूपमन्तर्दृशा
व्यचष्ट परितुष्टधीर्भुजगभोगभागाश्रयम् ॥५॥
कमलजन्मा ब्रह्मा सैकडों दिव्य वर्षों तक दृढ समाधि में स्थित रहे। उस समाधि
के तेज से उनमें ज्ञान का प्रकाश प्रफुल्लित हुआ। तब, सामान्य जनों के लिये
अदृश्य, आपका अद्भुत रूप उन्होंने अन्तर्दृष्टि द्वारा देखा, जो शेषनाग के
शरीर के भाग का आश्रय लिये हुए थे। वह रूप देख कर ब्रह्मा अत्यन्त सन्तुष्ट हो
गए।
किरीटमुकुटोल्लसत्कटकहारकेयूरयुङ्-
मणिस्फुरितमेखलं सुपरिवीतपीताम्बरम् ।
कलायकुसुमप्रभं गलतलोल्लसत्कौस्तुभं
वपुस्तदयि भावये कमलजन्मे दर्शितम् ॥६॥
मणिस्फुरितमेखलं सुपरिवीतपीताम्बरम् ।
कलायकुसुमप्रभं गलतलोल्लसत्कौस्तुभं
वपुस्तदयि भावये कमलजन्मे दर्शितम् ॥६॥
हे भगवन! किरीट और मुकुट से सुशोभित, कङ्गन हार और बाजूबन्द से युक्त, मणियों
से शोभायमान करधनी एवं सुचारु रूप से पहना हुआ पीताम्बर वाला, कलाय पुष्पों के
समान कोमल, गले में कौस्तुभ पहने हुए, आपके उस सुन्दर विग्रह का मैं ध्यान
करता हूं जो आपने ब्रह्मा जी को दिखाया।
श्रुतिप्रकरदर्शितप्रचुरवैभव श्रीपते
हरे जय जय प्रभो पदमुपैषि दिष्ट्या दृशो: ।
कुरुष्व धियमाशु मे भुवननिर्मितौ कर्मठा-
मिति द्रुहिणवर्णितस्वगुणबृंहिमा पाहि माम् ॥७॥
हरे जय जय प्रभो पदमुपैषि दिष्ट्या दृशो: ।
कुरुष्व धियमाशु मे भुवननिर्मितौ कर्मठा-
मिति द्रुहिणवर्णितस्वगुणबृंहिमा पाहि माम् ॥७॥
"हे लक्ष्मीपते! शास्त्रों के विभिन्न वाक्यों में आपका अनन्त वैभव प्रतिपादित
है। हे हरे! आपकी जय हो। हे प्रभू! सौभाग्य से आप मुझे दृष्टिगोचर हुए हैं।
कृपा करिये कि शीघ्र ही मेरे मन में सृष्टि रचना की क्षमता उत्पन्न हो।" इस
प्रकार ब्रह्मा ने आपके गुणों के समूहों का वर्णन किया। ऐसे आप मेरी रक्षा
करें।
लभस्व भुवनत्रयीरचनदक्षतामक्षतां
गृहाण मदनुग्रहं कुरु तपश्च भूयो विधे ।
भवत्वखिलसाधनी मयि च भक्तिरत्युत्कटे-
त्युदीर्य गिरमादधा मुदितचेतसं वेधसम् ॥८॥
गृहाण मदनुग्रहं कुरु तपश्च भूयो विधे ।
भवत्वखिलसाधनी मयि च भक्तिरत्युत्कटे-
त्युदीर्य गिरमादधा मुदितचेतसं वेधसम् ॥८॥
हे ब्रह्मन! आप फिर से तप करें और आपको तीनों भुवनों की रचना की अमिट दक्षता
प्राप्त हो। और मेरी कृपा से आपको मुझमें अनन्त सिद्धियों वाली तीव्रतम भक्ति
प्राप्त हो"। यह वचन कह कर (आपने) ब्रह्मा का चित्त उल्लासपूर्ण कर दिया।
शतं कृततपास्तत: स खलु दिव्यसंवत्सरा-
नवाप्य च तपोबलं मतिबलं च पूर्वाधिकम् ।
उदीक्ष्य किल कम्पितं पयसि पङ्कजं वायुना
भवद्बलविजृम्भित: पवनपाथसी पीतवान् ॥९॥
नवाप्य च तपोबलं मतिबलं च पूर्वाधिकम् ।
उदीक्ष्य किल कम्पितं पयसि पङ्कजं वायुना
भवद्बलविजृम्भित: पवनपाथसी पीतवान् ॥९॥
ब्रह्मा ने एक सौ दिव्य वर्षों तक तप किया। जिससे उन्हे पहले से अधिक तपोबल और
बुद्धिबल प्राप्त हुआ, और उन्होंने (एकार्णव के) जल में वायु से लहराता हुआ एक
कमल देखा। आपके बल से परिपूरित ब्रह्मा ने वायु और जल को पी लिया।
तवैव कृपया पुनस्सरसिजेन तेनैव स:
प्रकल्प्य भुवनत्रयीं प्रववृते प्रजानिर्मितौ ।
तथाविधकृपाभरो गुरुमरुत्पुराधीश्वर
त्वमाशु परिपाहि मां गुरुदयोक्षितैरीक्षितै: ॥१०॥
प्रकल्प्य भुवनत्रयीं प्रववृते प्रजानिर्मितौ ।
तथाविधकृपाभरो गुरुमरुत्पुराधीश्वर
त्वमाशु परिपाहि मां गुरुदयोक्षितैरीक्षितै: ॥१०॥
आपकी ही कृपा से ब्रह्मा ने उसी कमल के द्वारा त्रिभुवन की कल्पना की और प्रजा
के निर्माण में प्रवृत्त हुए। ऐसी कृपा से परिपूर्ण हे गुरुवायुरधीश्वर! महती
दया से आर्द्र अपने दृष्टिपातॊं से शीघ्र ही मेरी रक्षा करें।

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