Friday, September 21, 2012

श्रीमन् नारायणीम् - दशक २





श्रीमन् नारायणीम्  (श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) - दशक २

सूर्यस्पर्धिकिरीटमूर्ध्वतिलकप्रोद्भासिफालान्तरं
कारुण्याकुलनेत्रमार्द्रहसितोल्लासं सुनासापुटम्।
गण्डोद्यन्मकराभकुण्डलयुगं कण्ठोज्वलत्कौस्तुभं
त्वद्रूपं वनमाल्यहारपटलश्रीवत्सदीप्रं भजे॥१॥
 

:: हे भगवन्! मैं आपके उस रूप का ध्यान करता हूं जिसके मुकुट की प्रभा सूर्य से स्पर्धा करती है। भालप्रदेश ऊंचे लम्बे तिलक से उद्भासित है। करुणा से परिपूरित नेत्र हैं एवं मुख मधुर मन्द मुस्कान से उल्लसित हैं। नासिका अत्यन्त सुन्दर है। गण्डस्थल पर मकरकुण्डल युगल लटक रहे हैं और प्रतिबिम्बित हो रहे हैं। कण्ठप्रदेश कौस्तुभ मणि की कान्ति से चमक रहा है। वनमालाओं, हार समूहों एवं श्री वत्स से विभूषित आपके इस स्वरूप का मैं ध्यान करता हूं।   

केयूराङ्गदकङ्कणोत्तममहारत्नाङ्गुलीयाङ्कित-
श्रीमद्बाहुचतुष्कसङ्गतगदाशङ्खा
रिपङ्केरुहाम् ।
काञ्चित् काञ्चनकाञ्चिलाञ्च्छितलसत्पीता
म्बरालम्बिनी-
मालम्बे विमलाम्बुजद्युतिपदां मूर्तिं तवार्तिच्छिदम् ॥२॥
 

:: हे ईश! आपकी पावन चार भुजाएं बहुमूल्य रत्नो से युक्त केयूर, अङ्गद, कङ्गन आदि से अलंकृत हैं, एवं अङ्गुलियां भी बहुमूल्य रत्नों से जडित अंगूठियों से सुशोभित हैं तथा गदा, शङ्ख, चक्र एवं कमल धारण किये हुए हैं। आपका अवर्णनीय विग्रह सुवर्ण की करधनी से युक्त सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए है। आपके चरण निर्मल कमल की द्युति के समान उज्ज्वल हैं एवं पीडाओं का छेदन करने वाले हैं। ऐसे आपके श्रीविग्रह का मैं आश्रय लेता हूं।
 

यत्त्त्रैलोक्यमहीयसोऽपि महितं सम्मोहनं मोहनात्
कान्तं कान्तिनिधानतोऽपि मधुरं माधुर्यधुर्यादपि ।
सौन्दर्योत्तरतोऽपि सुन्दरतरं त्वद्रूपमाश्चर्यतोऽ-
प्याश्चर्यं भुवने न कस्य कुतुकं पुष्णाति विष्णो विभो ॥३॥
 

:: हे सर्वव्यापी विष्णु! त्रिलोक में जो महान है, उससे भी महनीय, मोहक से भी अत्यन्त मोहक, कान्ति की निधि से भी अधिक कान्तिमय, माधुर्य की धुरि से भी मधुरतम, अलौकिक सुन्दरता से भी सौन्दर्यशाली, अद्भुत लोकोत्तर आश्चर्य से भी आश्चर्यजनक आपका श्रीविग्रह, संसार में किसके कौतूहल को नहीं बढाता? अर्थात् सभी आपके रूप से अभिभूत हो जाते हैं।
 

तत्तादृङ्मधुरात्मकं तव वपु: सम्प्राप्य सम्पन्मयी
सा देवी परमोत्सुका चिरतरं नास्ते स्वभक्तेष्वपि ।
तेनास्या बत कष्टमच्युत विभो त्वद्रूपमानोज्ञक -
प्रेमस्थैर्यमयादचापलबलाच्चापल्
यवार्तोदभूत् ॥४॥
 

:: हे अच्युत! हे विभो! आपके ऐसे अनुपम मधुर्यपूर्ण श्रीविग्रह को पा कर , सम्पन्नता की देवी लक्ष्मी परम उत्सुकतावश अपने भक्तों के पास भी चिरकाल तक नहीं रहतीं। बडे कष्ट की बात है कि आपके इस अतिशय मनोहर रूप मे दृढ एवं स्थिर प्रेम से उत्पन्न अचापल्य के बल के कारण ही 'चपला' नाम की दुष्कीर्ति प्राप्त हुई है।
 

लक्ष्मीस्तावकरामणीयकहृतैवेयं परेष्वस्थिरे-
त्यस्मिन्नन्यदपि प्रमाणमधुना वक्ष्यामि लक्ष्मीपते ।
ये त्वद्ध्यानगुणानुकीर्तनरसासक्ता हि भक्ता जना-
स्तेष्वेषा वसति स्थिरैव दयितप्रस्तावदत्तादरा ॥५॥
 

:: लक्ष्मी आपके रमणीय रूप से अभिभूत हो कर औरों के यहां स्थिरता से नहीं रहती हैं। इस बात का एक और प्रमाण मैं बतलाता हूं। हे लक्ष्मीपते! जो जन आपके ध्यान में रहते हैं एवं आपके ही गुण्गान के आनन्द में विभोर रहते हैं, ऐसे ही प्रेमी भक्तजनों के प्रस्ताव को आदर देती हुई, लक्ष्मी उनके यहां ही स्थिरता से रहती है।
 

एवंभूतमनोज्ञतानवसुधानिष्यन्दसन्दोहनं
त्वद्रूपं परचिद्रसायनमयं चेतोहरं शृण्वताम् ।
सद्य: प्रेरयते मतिं मदयते रोमाञ्चयत्यङ्गकं
व्यासिञ्चत्यपि शीतवाष्पविसरैरानन्दमूर्छोद्भवै
: ॥६॥
 

:: मन से जाने जाने वाले आपके इस रूपसे निर्मल मधु निरन्तर प्रवाहित होता है। आपका स्वरूप परम चित् आनन्द का सम्मिश्रण है और चित्त को चुराने वाला है। आपकी कथाओं को प्रेम से सुनने वालों की बुद्धि को तत्काल प्रेरणा दे कर आनन्दातिरेक से उन्मत्त बनाने वाला है। यह शरीर को पुलकित कर देता है और आनन्द के अतिरेक से मूर्च्छा के कारण उदूत शीतल अश्रुओं के प्रवाह से शरीर को सिञ्चित करने वाला है।
 

एवंभूततया हि भक्त्यभिहितो योगस्स योगद्वयात्
कर्मज्ञानमयात् भृशोत्तमतरो योगीश्वरैर्गीयते ।
सौन्दर्यैकरसात्मके त्वयि खलु प्रेमप्रकर्षात्मिका
भक्तिर्निश्रममेव विश्वपुरुषैर्लभ्या रमावल्लभ ॥७॥
 

:: हे रमावल्लभ! इन्ही कारणो से वह भक्ति नामक योग अन्य योग द्वय - कर्म योग एवं ज्ञान योग से अत्यधिक उत्कृष्ट है। व्यास नारदादि योगीश्वरों द्वारा भी ऐसा कहा गया है। निश्चय ही मूर्तिमान सौन्दर्य स्वरूप आप में प्रेम लक्षणा भक्ति, संसार में लोगों को सहज ही उपल्ब्ध हो जाती है।
 

निष्कामं नियतस्वधर्मचरणं यत् कर्मयोगाभिधं
तद्दूरेत्यफलं यदौपनिषदज्ञानोपलभ्यं पुन: ।
तत्त्वव्यक्ततया सुदुर्गमतरं चित्तस्य तस्माद्विभो
त्वत्प्रेमात्मकभक्तिरेव सततं स्वादीयसी श्रेयसी ॥८॥
 

:: निष्कामता से युक्त स्वधर्म का अनुगमन किये जाने वाला कर्मयोग नामक जो विधान है वह सुदूर भविष्य में फल प्रदान करने वाला है। फिर जो उपनिषदों में निहित ज्ञान के द्वारा प्राप्य है, उसे भी अस्पष्टता के कारण चित्त के लिये प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। हे विभो! इसी कारण से आपके प्रेम से परिपूर्ण भक्ति ही सदैव स्वादिष्टतर तथा श्रेष्ठ है।
 

अत्यायासकराणि कर्मपटलान्याचर्य निर्यन्मला
बोधे भक्तिपथेऽथवाऽप्युचिततामायान्ति किं तावता ।
क्लिष्ट्वा तर्कपथे परं तव वपुर्ब्रह्माख्यमन्ये पुन-
श्चित्तार्द्रत्वमृते विचिन्त्य बहुभिस्सिद्ध्यन्ति जन्मान्तरै: ॥९॥
 

:: कठोर परिश्रम से कर्मो के समूहों का आचरण करके निर्मल हुए मन वाले लोग ज्ञान अथवा भक्ति मार्ग में अधिकार पाते हैं। उनका क्या? कुछ जन वेदान्त मार्ग में अत्यन्त कष्ट से ब्रह्ममय आपके स्वरूप को, जो ब्रह्म ही कहलाता है, सिद्ध कर पाते हैं। तथा अन्य जन चित्त की निर्मलता के बिना बहुत चिन्तन करके, जन्मान्तरों में सिद्धि को प्राप्त करते हैं।
 

त्वद्भक्तिस्तु कथारसामृतझरीनिर्मज्जनेन स्वयं
सिद्ध्यन्ती विमलप्रबोधपदवीमक्लेशतस्तन्वती ।
सद्यस्सिद्धिकरी जयत्ययि विभो सैवास्तु मे त्वत्पद-
प्रेमप्रौढिरसार्द्रता द्रुततरं वातालयाधीश्वर ॥१०॥
 

:: हे विभो! आपके कथारस के अमृत निर्झर में निमज्जन करने से आपकी भक्ति स्वयं ही सिद्ध होती है। निर्मल ज्ञान के पद को अनायास ही सिद्ध करके प्रदान करती है। इसीलिये कर्मयोग एवं ज्ञानयोग से श्रेष्ठतर है। हे वातालय के अधीश्वर! आपके चरणो मे प्रेम के द्वारा उत्कृष्ट रस से द्रवीभूत करने वाली वह भक्ति ही मुझे अति शीघ्रता से प्राप्त हो।
ॐ नमो नारायणाय नम:  

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