Friday, September 21, 2012
श्रीमन् नारायणीम् - दशक २
सूर्यस्पर्धिकिरीटमूर्ध्वतिलकप्
केयूराङ्गदकङ्कणोत्तममहारत्नाङ्
:: हे ईश! आपकी पावन चार भुजाएं बहुमूल्य रत्नो से युक्त केयूर, अङ्गद, कङ्गन आदि से अलंकृत हैं, एवं अङ्गुलियां भी बहुमूल्य रत्नों से जडित अंगूठियों से सुशोभित हैं तथा गदा, शङ्ख, चक्र एवं कमल धारण किये हुए हैं। आपका अवर्णनीय विग्रह सुवर्ण की करधनी से युक्त सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए है। आपके चरण निर्मल कमल की द्युति के समान उज्ज्वल हैं एवं पीडाओं का छेदन करने वाले हैं। ऐसे आपके श्रीविग्रह का मैं आश्रय लेता हूं।
यत्त्त्रैलोक्यमहीयसोऽपि महितं सम्मोहनं मोहनात्
:: हे सर्वव्यापी विष्णु! त्रिलोक में जो महान है, उससे भी महनीय, मोहक से भी अत्यन्त मोहक, कान्ति की निधि से भी अधिक कान्तिमय, माधुर्य की धुरि से भी मधुरतम, अलौकिक सुन्दरता से भी सौन्दर्यशाली, अद्भुत लोकोत्तर आश्चर्य से भी आश्चर्यजनक आपका श्रीविग्रह, संसार में किसके कौतूहल को नहीं बढाता? अर्थात् सभी आपके रूप से अभिभूत हो जाते हैं।
तत्तादृङ्मधुरात्मकं तव वपु: सम्प्राप्य सम्पन्मयी
:: हे अच्युत! हे विभो! आपके ऐसे अनुपम मधुर्यपूर्ण श्रीविग्रह को पा कर , सम्पन्नता की देवी लक्ष्मी परम उत्सुकतावश अपने भक्तों के पास भी चिरकाल तक नहीं रहतीं। बडे कष्ट की बात है कि आपके इस अतिशय मनोहर रूप मे दृढ एवं स्थिर प्रेम से उत्पन्न अचापल्य के बल के कारण ही 'चपला' नाम की दुष्कीर्ति प्राप्त हुई है।
लक्ष्मीस्तावकरामणीयकहृतैवेयं परेष्वस्थिरे-
:: लक्ष्मी आपके रमणीय रूप से अभिभूत हो कर औरों के यहां स्थिरता से नहीं रहती हैं। इस बात का एक और प्रमाण मैं बतलाता हूं। हे लक्ष्मीपते! जो जन आपके ध्यान में रहते हैं एवं आपके ही गुण्गान के आनन्द में विभोर रहते हैं, ऐसे ही प्रेमी भक्तजनों के प्रस्ताव को आदर देती हुई, लक्ष्मी उनके यहां ही स्थिरता से रहती है।
एवंभूतमनोज्ञतानवसुधानिष्यन्
:: मन से जाने जाने वाले आपके इस रूपसे निर्मल मधु निरन्तर प्रवाहित होता है। आपका स्वरूप परम चित् आनन्द का सम्मिश्रण है और चित्त को चुराने वाला है। आपकी कथाओं को प्रेम से सुनने वालों की बुद्धि को तत्काल प्रेरणा दे कर आनन्दातिरेक से उन्मत्त बनाने वाला है। यह शरीर को पुलकित कर देता है और आनन्द के अतिरेक से मूर्च्छा के कारण उदूत शीतल अश्रुओं के प्रवाह से शरीर को सिञ्चित करने वाला है।
एवंभूततया हि भक्त्यभिहितो योगस्स योगद्वयात्
:: हे रमावल्लभ! इन्ही कारणो से वह भक्ति नामक योग अन्य योग द्वय - कर्म योग एवं ज्ञान योग से अत्यधिक उत्कृष्ट है। व्यास नारदादि योगीश्वरों द्वारा भी ऐसा कहा गया है। निश्चय ही मूर्तिमान सौन्दर्य स्वरूप आप में प्रेम लक्षणा भक्ति, संसार में लोगों को सहज ही उपल्ब्ध हो जाती है।
निष्कामं नियतस्वधर्मचरणं यत् कर्मयोगाभिधं
:: निष्कामता से युक्त स्वधर्म का अनुगमन किये जाने वाला कर्मयोग नामक जो विधान है वह सुदूर भविष्य में फल प्रदान करने वाला है। फिर जो उपनिषदों में निहित ज्ञान के द्वारा प्राप्य है, उसे भी अस्पष्टता के कारण चित्त के लिये प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है। हे विभो! इसी कारण से आपके प्रेम से परिपूर्ण भक्ति ही सदैव स्वादिष्टतर तथा श्रेष्ठ है।
अत्यायासकराणि कर्मपटलान्याचर्य निर्यन्मला
:: कठोर परिश्रम से कर्मो के समूहों का आचरण करके निर्मल हुए मन वाले लोग ज्ञान अथवा भक्ति मार्ग में अधिकार पाते हैं। उनका क्या? कुछ जन वेदान्त मार्ग में अत्यन्त कष्ट से ब्रह्ममय आपके स्वरूप को, जो ब्रह्म ही कहलाता है, सिद्ध कर पाते हैं। तथा अन्य जन चित्त की निर्मलता के बिना बहुत चिन्तन करके, जन्मान्तरों में सिद्धि को प्राप्त करते हैं।
त्वद्भक्तिस्तु कथारसामृतझरीनिर्मज्जनेन स्वयं
:: हे विभो! आपके कथारस के अमृत निर्झर में निमज्जन करने से आपकी भक्ति स्वयं ही सिद्ध होती है। निर्मल ज्ञान के पद को अनायास ही सिद्ध करके प्रदान करती है। इसीलिये कर्मयोग एवं ज्ञानयोग से श्रेष्ठतर है। हे वातालय के अधीश्वर! आपके चरणो मे प्रेम के द्वारा उत्कृष्ट रस से द्रवीभूत करने वाली वह भक्ति ही मुझे अति शीघ्रता से प्राप्त हो।
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