Friday, September 21, 2012

श्रीमन् नारायणीम् - दशक - ८

श्रीमन् नारायणीम्  *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - ८ 

एवं तावत् प्राकृतप्रक्षयान्ते
ब्राह्मे कल्पे ह्यादिमे लब्धजन्मा ।
ब्रह्मा भूयस्त्वत्त एवाप्य वेदान्
सृष्टिं चक्रे पूर्वकल्पोपमानाम् ॥१॥
 

तब, इस प्रकार, प्राकृत प्रलय के अन्त में जो प्रथम ब्राह्म कल्प था, ब्रह्मा
ने जन्म पाकर, आप ही से फिर से वेदों का ज्ञान पा कर, पहले के कल्प के ही समान
सृष्टि की रचना की।



सोऽयं चतुर्युगसहस्रमितान्यहानि
तावन्मिताश्च रजनीर्बहुशो निनाय ।
निद्रात्यसौ त्वयि निलीय समं स्वसृष्टै-
र्नैमित्तिकप्रलयमाहुरतोऽस्य रात्रिम् ॥२॥
 

उन ब्रह्मा का एक दिन एक चतुर्युग की अवधी वाला और एक रात्रि उतनी ही अवधी
वाली होती है। इस प्रकार बहुत से दिन और रात्रियां व्यतीत कर के , वे निद्रा
के वशीभूत हो कर, स्व रचित सृष्टि के साथ आप में ही विलीन हो जाते हैं।
ब्रह्मा की यह रात्रि नैमित्तिक प्रलय कहलाती है।



अस्मादृशां पुनरहर्मुखकृत्यतुल्यां
सृष्टिं करोत्यनुदिनं स भवत्प्रसादात् ।
प्राग्ब्राह्मकल्पजनुषां च परायुषां तु
सुप्तप्रबोधनसमास्ति तदाऽपि सृष्टि: ॥३॥
 

जिस प्रकार हम लोग हर दिन की प्रात:कालीन क्रियायें करते हैं आपकी कृपा से,
उसी प्रकार ब्रह्मा हर दिन सृष्टि की रचना करते हैं। ब्राह्म कल्प के पहले
उत्पन्न हुए जन अथवा अनन्त आयु वाले जनों के लिये तो फिर भी यह सृष्टि सो कर
जागने के समान ही है।



पञ्चाशदब्दमधुना स्ववयोर्धरूप-
मेकं परार्धमतिवृत्य हि वर्ततेऽसौ ।
तत्रान्त्यरात्रिजनितान् कथयामि भूमन्
पश्चाद्दिनावतरणे च भवद्विलासान् ॥४॥
 

इस समय वे ब्रह्मा अपनी आयु के आधे भाग, अर्थात पचास वर्ष जो एक परार्ध कहलाता
है, व्यतीत करके स्थित हैं। हे भूमन! उस परार्ध की अन्तिम रात्रि और दूसरे
परार्ध के आरम्भ के दिन में घटित होने वाली आपकी लीलाओं का अब मैं वर्णन
करूंगा।


दिनावसानेऽथ सरोजयोनि:
सुषुप्तिकामस्त्वयि सन्निलिल्ये ।
जगन्ति च त्वज्जठरं समीयु-
स्तदेदमेकार्णवमास विश्वम् ॥५॥
 

दिन के बीत जाने पर ब्रह्मा , सोने की इच्छा से आप ही में विलीन हो गये और यह
जगत भी आप के ही उदर में समा गया। तब यह सब कुछ एक समुद्र के समान ही हो कर रह
गया।




तवैव वेषे फणिराजि शेषे
जलैकशेषे भुवने स्म शेषे ।
आनन्दसान्द्रानुभवस्वरूप:
स्वयोगनिद्रापरिमुद्रितात्मा ॥६॥
 

समस्त भुवनों के जल मग्न हो जाने पर अपने ही प्रतिरूप शेष नाग पर, स्वयं को
योगनिद्रा से आवृत्त कर के, आनन्द घन अनुभव स्वरूप आप शयन करने लगे।


कालाख्यशक्तिं प्रलयावसाने
प्रबोधयेत्यादिशता किलादौ ।
त्वया प्रसुप्तं परिसुप्तशक्ति-
व्रजेन तत्राखिलजीवधाम्ना ॥७॥
 
इस प्रकार प्रलय के आरम्भ में, आपमें शक्तियों के समूह विलीन हो गये थे। समस्त
जीवों के विश्राम स्वरूप आप तब, समय नामक शक्ति को यह आदेश दे कर कि - 'प्रलय
के अन्त में जगा देना", सो गये।
 

चतुर्युगाणां च सहस्रमेवं
त्वयि प्रसुप्ते पुनरद्वितीये ।
कालाख्यशक्ति: प्रथमप्रबुद्धा
प्राबोधयत्त्वां किल विश्वनाथ ॥८॥
 
हे अद्वितीय विश्वनाथ! इस प्रकार एक सहस्र चतुर्युगों तक आपके सो जाने पर, समय
नामक शक्ति ने पहले जागृत हो कर, फिर निश्चय ही आपको जगाया।
विबुध्य च त्वं जलगर्भशायिन्
विलोक्य लोकानखिलान् प्रलीनान् ।
तेष्वेव सूक्ष्मात्मतया निजान्त: -
स्थितेषु विश्वेषु ददाथ दृष्टिम् ॥९॥
 
एकार्णव हुए जगत के मध्य में शयन करने वाले हे भगवन! जाग कर फिर आपने समस्त
लोकों को विलीन हुए देखा। आप ही में सूक्ष्म रूप से स्थित उन समस्त विश्वों पर
आपने दृष्टि डाली।
 

ततस्त्वदीयादयि नाभिरन्ध्रा-
दुदञ्चितं किंचन दिव्यपद्मम् ।
निलीननिश्शेषपदार्थमाला-
संक्षेपरूपं मुकुलायमानम् ॥१०॥
 
फिर हे भगवन! आप ही के नाभि छिद्र से एक दिव्य कमल उद्भूत हुआ, जो अभी कली की
अवस्था ही में था। उसमें समस्त पदार्थ समूह संक्षिप्त बीज रूप में समाया हुआ
था।
 

तदेतदंभोरुहकुड्मलं ते
कलेवरात् तोयपथे प्ररूढम् ।
बहिर्निरीतं परित: स्फुरद्भि:
स्वधामभिर्ध्वान्तमलं न्यकृन्तत् ॥११॥
 
आपके शरीर से अंकुरित वह कमल कली जल के मध्य से निकल कर बाहर आ गई। उसके तेज
से जो प्रकाश चारों ओर स्फुरित हो रहा था, उस तेजोमय प्रकाश से समस्त अन्धकार
पूर्णतया नष्ट हो गया।
 

संफुल्लपत्रे नितरां विचित्रे
तस्मिन् भवद्वीर्यधृते सरोजे ।
स पद्मजन्मा विधिराविरासीत्
स्वयंप्रबुद्धाखिलवेदराशि: ॥१२॥
 
आपकी शक्ति से धारित सुविकसित दल वाले उस अत्यन्त विचित्र कमल के ऊपर
पद्मजन्मा ब्रह्मा आविर्भूत हुए, जिन्हें पहले से ही समस्त वेद राशि का ज्ञान
था।
 

अस्मिन् परात्मन् ननु पाद्मकल्पे
त्वमित्थमुत्थापितपद्मयोनि: ।
अनन्तभूमा मम रोगराशिं
निरुन्धि वातालयवास विष्णो ॥१३॥
 
अनन्त वीर्यान्वित भूमन! इस प्रकार पाद्मकल्प में निश्चय ही आपने ब्रह्मा को
आविर्भूत किया। हे गुरुवायुरवासिन परमात्मन! मेरी रोगों की राशि को नष्ट करें।

ॐ नमो नारायणाय नम:  


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