Friday, September 21, 2012

श्रीमन् नारायणीम् - दशक - ६

श्रीमन् नारायणीम् *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - ६

एवं चतुर्दशजगन्मयतां गतस्य
पातालमीश तव पादतलं वदन्ति ।
पादोर्ध्वदेशमपि देव रसातलं ते
गुल्फद्वयं खलु महातलमद्भुतात्मन् ॥१॥
 


हे अद्भुत आत्मन देवेश्वर! इस प्रकार चौदह भुवन रूपता को प्राप्त हुए आपके
चरणों के तलवे को इस जगत का पाताल , पांव के ऊपर के हिस्से को रसातल, और आपके
दोनों टखनों को महातल कहा गया हैं।


जङ्घे तलातलमथो सुतलं च जानू
किञ्चोरुभागयुगलं वितलातले द्वे ।
क्षोणीतलं जघनमम्बरमङ्ग नाभि-
र्वक्षश्च शक्रनिलयस्तव चक्रपाणे ॥२॥

आपकी दोनों पिंडलियां तलातल हैं। और फिर दोनों घुटने सुतल हैं। और भी, जङ्घा
के ऊपरी और्र निचले भाग दोनों वितल और अतल हैं। आपका जघन भाग पृथ्वी है। हे
ईश्वर! आकाश आपकी नाभि है। और हे चक्रपाणि! आपका वक्षस्थल इन्द्र का निवास
स्थान (स्वर्ग) है।


ग्रीवा महस्तव मुखं च जनस्तपस्तु
फालं शिरस्तव समस्तमयस्य सत्यम् ।
एवं जगन्मयतनो जगदाश्रितैर-
प्यन्यैर्निबद्धवपुषे भगवन्नमस्ते ॥३॥
 


हे विश्वात्मक! आपका कण्ठ महर्लोक है, मुख जन लोक है, ललाट तप लोक है और
सर्वस्वमय आपका सिर सत्यलोक है। हे भगवन! जगत से सम्बन्धित जितनी भी वस्तुएं
या अवयव हैं, सभी आपमें समाहित है, ऐसे शरीर वाले आपको नमस्कार है।


त्वद्ब्रह्मरन्ध्रपदमीश्वर विश्वकन्द
छन्दांसि केशव घनास्तव केशपाशा: ।
उल्लासिचिल्लियुगलं द्रुहिणस्य गेहं
पक्ष्माणि रात्रिदिवसौ सविता च नेत्रै ॥४॥
 


विश्व के कारणभूत हे ईश्वर! आपका ब्रह्मरन्ध्र वेद हैं। हे केशव! आपके केशसमूह
मेघ हैं, शोभाशाली भ्रू युगल ब्रह्मा का घर है, आपकी दोनों पलकें रात और दिन
हैं, और आपके दोनों नेत्र सूर्य है।


निश्शेषविश्वरचना च कटाक्षमोक्ष:
कर्णौ दिशोऽश्वियुगलं तव नासिके द्वे ।
लोभत्रपे च भगवन्नधरोत्तरोष्ठौ
तारागणाश्च दशना: शमनश्च दंष्ट्रा ॥५॥
 


हे भगवन! असीमित विश्व की रचना आपका दृष्टिपात है, कान दिशाएं हैं, अश्विनि
कुमार दोनों नासिकाएं हैं, लोभ और लज्जा अधर और उत्तर ओष्ट हैं। तारा गण आपके
दांत और यमराज आपकी दाढें हैं।


माया विलासहसितं श्वसितं समीरो
जिह्वा जलं वचनमीश शकुन्तपङ्क्ति: ।
सिद्धादय: स्वरगणा मुखरन्ध्रमग्नि-
र्देवा भुजा: स्तनयुगं तव धर्मदेव: ॥६॥
 


हे ईश्वर! आपकी लीलापूर्ण हंसी माया है, श्वास वायु है, जिह्वा जल है, वचन
पक्षि समूह है, स्वर समुदाय सिद्धगण हैं, मुख छिद्र अग्नि है, भुजाएं देवगण
हैं, और आपके स्तन युगल धर्म देव हैं।


पृष्ठं त्वधर्म इह देव मन: सुधांशु -
रव्यक्तमेव हृदयंबुजमम्बुजाक्ष ।
कुक्षि: समुद्रनिवहा वसनं तु सन्ध्ये
शेफ: प्रजापतिरसौ वृषणौ च मित्र: ॥७॥
 


हे देव इस संसार में आपकी पीठ अधर्म है, मन चन्द्रमा है, अव्यक्त हृदय कमल है।
हे कमलनयन! आपकी कुक्षी समुद्र समुदाय है, वस्त्र दोनों सन्ध्यायें है, लिङ्ग
प्रजापति हैं और ये अण्डकोश मित्र देवता हैं।


श्रोणीस्थलं मृगगणा: पदयोर्नखास्ते
हस्त्युष्ट्रसैन्धवमुखा गमनं तु काल: ।
विप्रादिवर्णभवनं वदनाब्जबाहु-
चारूरुयुग्मचरणं करुणांबुधे ते ॥८॥
 


हे करुणासागर! आपका कटिभाग मृगसमूह है, आपके चरणों के नख हाथी ऊंट घोडे आदि
हैं, आपकी चाल समय है, आपके मुखकमल, भुजाएं, दोनों सुन्दर जङ्घा एवं चरण,
क्रमश: ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य एवं शूद्र के उत्पत्ति स्थल हैं।


संसारचक्रमयि चक्रधर क्रियास्ते
वीर्यं महासुरगणोऽस्थिकुलानि शैला: ।
नाड्यस्सरित्समुदयस्तरवश्च रोम
जीयादिदं वपुरनिर्वचनीयमीश ॥९॥
 


हे चक्रधर! यह संसार चक्र आपकी क्रियाएं हैं, महान असुरों का समुदाय आपका
वीर्य है, पर्वत अस्थि समूह हैं, नदियों का समूह नाडियां है, पेड आपके रोम
हैं। हे ईश्वर! आपके ऐसे इस अवर्णनीय शरीर की जय हो।


ईदृग्जगन्मयवपुस्तव कर्मभाजां
कर्मावसानसमये स्मरणीयमाहु: ।
तस्यान्तरात्मवपुषे विमलात्मने ते
वातालयाधिप नमोऽस्तु निरुन्धि रोगान् ॥१०॥
 


हे गुरुवायुरीश्वर! इस प्रकार के जगत मय विराट स्वरूप आप जीवमात्र के लिये ,
उनके कर्मावसान के समय स्मरणीय हैं, ऐसा कहा जाता है। उस विराट स्वरूप में
निर्मल सात्विक अन्तरयामी रूपवाले आपको नमस्कार है। मेर रोगों का नाश करें।


ॐ नमो नारायणाय नम:

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