Saturday, September 29, 2012

श्रीमन् नारायणीम् - दशक - १४







श्रीमन् नारायणीम् *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - १४


समनुस्मृततावकाङ्घ्रियुग्म: स मनु: पङ्कजसम्भवाङ्गजन्मा ।
निजमन्तरमन्तरायहीनं चरितं ते कथयन् सुखं निनाय ॥१॥

उन मनु ने, जो कमलयोनि ब्रह्मा के अङ्ग से पैदा हुए थे, और आपके दोनों चरण कमलों का ध्यान करते रहते थे, आपकी लीला कथाओं को कहते हुए, अपने विकारहीन मन्वन्तर का सुख से वहन किया।



समये खलु तत्र कर्दमाख्यो द्रुहिणच्छायभवस्तदीयवाचा ।
धृतसर्गरसो निसर्गरम्यं भगवंस्त्वामयुतं समा: सिषेवे ॥२॥

हे भगवन! उसी समय ब्रह्मा की छाया से उत्पन्न कर्दम नाम के ऋषि ब्रह्मा के ही आदेश से, सृजन करने की इच्छा से, दस हजार वर्षों तक, स्वभावत: सुन्दर आपकी ही तपस्या करते रहे।


गरुडोपरि कालमेघक्रमं विलसत्केलिसरोजपाणिपद्मम् ।
हसितोल्लसिताननं विभो त्वं वपुराविष्कुरुषे स्म कर्दमाय ॥३॥

हे विभो! गरुड पर सवार, काले मेघों के समान श्याम, हस्तकमल में कोमल कमल लिये हुए, मुस्कुराते हुए प्रफुल्ल मुख वाले आपने अपना अति शोभनीय विग्रह कर्दम के लिये प्रकट किया।


स्तुवते पुलकावृताय तस्मै मनुपुत्रीं दयितां नवापि पुत्री: ।
कपिलं च सुतं स्वमेव पश्चात् स्वगतिं चाप्यनुगृह्य निर्गतोऽभू: ॥४॥

रोमाञ्चित हुए स्तुति करते हुए हर्ष और रोमाञ्च से परिपूर्ण कर्दम को आपने पत्नी रूप में मनु की पुत्री को दिया, नौ पुत्रियां और कपिल नामक पुत्र को भी दिया। अन्त में आपने स्वयं को दे दिया और मोक्ष भी प्रदान कर के चले गये।


स मनु: शतरूपया महिष्या गुणवत्या सुतया च देवहूत्या ।
भवदीरितनारदोपदिष्ट: समगात् कर्दममागतिप्रतक्षम् ॥५॥

वह मनु, अपनी रानी शतरूपा और गुणवती पुत्री देवहूति के साथ कर्दम के पास गये जो उन्ही के आगमन की प्रतीक्षा कर रहे थे। आपकी प्रेरणा से नारद ने उन्हे यह आदेश दिया था।


मनुनोपहृतां च देवहूतिं तरुणीरत्नमवाप्य कर्दमोऽसौ ।
भवदर्चननिवृतोऽपि तस्यां दृढशुश्रूषणया दधौ प्रसादम् ॥६॥

मनु ने तरुणी रत्न देवहूति को कर्दम को उपहार में दे दिया। कर्दम निरन्तर आपकी अर्चना में सन्लग्न रहते थे, फिर भी देवहुति की दृढ सेवा से वे प्रसन्न हो गये।


स पुनस्त्वदुपासनप्रभावा- द्दयिताकामकृते कृते विमाने ।
वनिताकुलसङ्कुलो नवात्मा व्यहरद्देवपथेषु देवहूत्या ॥७॥

तब उसने आपकी अर्चना के प्रभाव से और अपनी पत्नी की कामना की पूर्ति के लिये एक विमान की रचना की। उस विमान में वनिताओं के समूह थे। कर्दम नया स्वरूप धारण कर के उस विमान में देवहुति के संग देव उद्यानों में विचरने लगे।


शतवर्षमथ व्यतीत्य सोऽयं नव कन्या: समवाप्य धन्यरूपा: ।
वनयानसमुद्यतोऽपि कान्ता- हितकृत्त्वज्जननोत्सुको न्यवात्सीत् ॥८॥

इस प्रकार कर्दम ने सौ वर्ष व्यतीत कर दिये और उन्हे नौ रूपवती कन्याओं की प्राप्ति हुई। फिर वन को जाने के लिये तत्पर होते हुए भी, पत्नी के हित के लिये और आपके जन्म की उत्सुकता में वे घर में ही रुके रहे और वन नहीं गये।


निजभर्तृगिरा भवन्निषेवा- निरतायामथ देव देवहूत्याम् ।
कपिलस्त्वमजायथा जनानां प्रथयिष्यन् परमात्मतत्त्वविद्याम् ॥९॥

अपने पति के कहने से देवहुति आपकी सेवा में संलग्न हो गई। तत्पश्चात हे देव! आपने उसके गर्भ से कपिल के रूप में जन्म लिया। आपके इस अवतार का उद्येश्य था कि लोगों में परम तत्व की विद्या प्रकट हो।


वनमेयुषि कर्दमे प्रसन्ने मतसर्वस्वमुपादिशन् जनन्यै ।
कपिलात्मक वायुमन्दिरेश त्वरितं त्वं परिपाहि मां गदौघात् ॥१०॥

प्रसन्न चित्त कर्दम वन को चले गये। तब आपने अपनी माता को सम्पूर्ण सिद्धान्तो का उपदेश दिया। हे कपिलात्मक वायु मन्दिर के ईश्वर! समस्त रोग समूहों से मेरी शीघ्रता से रक्षा करें।


ॐ नमो नारायणाय नम: ..

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