श्रीमन् नारायणीम् *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - ४
कल्यतां मम कुरुष्व तावतीं कल्यते भवदुपासनं यया ।
स्पष्टमष्टविधयोगचर्यया पुष्टयाशु तव तुष्टिमाप्नुयाम् ॥१॥
हे ईश! मुझको कम से कम इतना स्वास्थ्य प्रदान कीजिये जिससे मैं आपकी उपासना कर
सकूं। फिर निश्चय ही अष्टाङ्ग योग का पालन करके, शीघ्र ही पुष्टि लाभ करके,
आपकी प्रसन्नता प्राप्त कर लूंगा।
ब्रह्मचर्यदृढतादिभिर्यमैराप्लवादिनियमैश्च पाविता: ।
कुर्महे दृढममी सुखासनं पङ्कजाद्यमपि वा भवत्परा: ॥२॥
हे ईश! हम, आपके भक्त, ब्रह्मचर्य आदि यमों के द्वारा दृढ हो कर एवं स्नान आदि
नियमों से पवित्र हो कर, आपके सम्मुख हो कर पद्मासन या सुखासन आदि को भी दृढता
से अभ्यास करेंगे।
तारमन्तरनुचिन्त्य सन्ततं प्राणवायुमभियम्य निर्मला: ।
इन्द्रियाणि विषयादथापहृत्यास्महे भवदुपासनोन्मुखा: ॥३॥
हे ईश! अन्तरमन में निरन्तर प्रणव का ध्यान धारण करके प्राण वायु का सुसंचार
करके फिर इन्द्रियों को विषयों से हटा कर हम आपकी उपासना के लिए प्रस्तुत हो
जायेंगे।
अस्फुटे वपुषि ते प्रयत्नतो धारयेम धिषणां मुहुर्मुहु: ।
तेन भक्तिरसमन्तरार्द्रतामुद्वहेम भवदङ्घ्रिचिन्तका ॥४॥
हे ईश! आपके अस्पष्ट विग्रह पर यत्नत: बुद्धि को बार बार लगायेंगे। इस प्रकार
सतत अभ्यास से भक्ति रस एवं चित्त की कोमलता प्राप्त कर के आपके चरण कमलों के
पुजारी हो जायेंगे।
विस्फुटावयवभेदसुन्दरं त्वद्वपु: सुचिरशीलनावशात् ।
अश्रमं मनसि चिन्तयामहे ध्यानयोगनिरतास्त्वदाश्रयाः ॥५॥
हे ईश! चिरकाल तक ध्यानावस्थित रहने के कारण स्पष्ट हो रहे आपके श्रीविग्रह के
पादादिकेशान्त (चरणों से केशों तक) अवयव भेद में अनायास ही ध्यान लग जायेगा।
ध्यान योग में लगे हुए हम, आपके भक्त, आपके आश्रित हो जायेंगे।
ध्यायतां सकलमूर्तिमीदृशीमुन्मिषन्मधुरताहृतात्मनाम् ।
सान्द्रमोदरसरूपमान्तरं ब्रह्म रूपमयि तेऽवभासते ॥६॥
हे ईश! आपकी ऐसी कलामयी (सगुण) मूर्ति का ध्यान करने से मन में उत्पन्न हुई
मधुरता वालों के हृदय में, घनीभूत आनन्द स्वरूप आपका ब्रह्म (निर्गुण) रूप
उद्भासित हो जाता है।
तत्समास्वदनरूपिणीं स्थितिं त्वत्समाधिमयि विश्वनायक ।
आश्रिता: पुनरत: परिच्युतावारभेमहि च धारणादिकम् ॥७॥
हे विश्वनायक! उस अनुभव के रसास्वादन की स्थिति से प्राप्त आपकी समाधि के
आश्रित हुए हम, यदि पुन: वहां से च्युत हो जाएं, तो फिर से धारणा आदि योग के
अभ्यास का आरम्भ करेंगे।
इत्थमभ्यसननिर्भरोल्लसत्त्वत्परात्मसुखकल्पितोत्सवा: ।
मुक्तभक्तकुलमौलितां गता: सञ्चरेम शुकनारदादिवत् ॥८॥
हे ईश! इस प्रकार से अभ्यास करते हुए स्वतन्त्रता से अभिभूत होते हुए, आपके
परात्म सुख से उत्पन्न उत्साह वाले हम जीवन्मुक्त भक्तों के कुल के शिरोमणि
शुक नारद आदि के समान विचरण करेंगे।
त्वत्समाधिविजये तु य: पुनर्मङ्क्षु मोक्षरसिक: क्रमेण वा ।
योगवश्यमनिलं षडाश्रयैरुन्नयत्यज सुषुम्नया शनै: ॥९॥
हे अज! आपकी समाधि पा कर जो जन सद्य मुक्ति चाहता है अथवा जो जन क्रममुक्ति
चाहता है, वह योग के प्रभाव से प्राण वायु को षट् चक्रों के सहारे सुषुम्ना
नाडी के द्वारा, धीरे धीरे ऊपर को ले जाता है।
लिङ्गदेहमपि सन्त्यजन्नथो लीयते त्वयि परे निराग्रह: ।
ऊर्ध्वलोककुतुकी तु मूर्धत: सार्धमेव करणैर्निरीयते ॥१०॥
निराग्रही जन लिङ्ग देह का भी त्याग कर के आपके ब्रह्म स्वरूप में विलीन हो
जाता है। किन्तु ऊर्ध्व लोकों का अभिलाषी ब्रह्मरन्ध्र को भेद कर इन्द्रियों
के सहित ही ऊपर चला जाता है।
अग्निवासरवलर्क्षपक्षगैरुत्तरायणजुषा च दैवतै: ।
प्रापितो रविपदं भवत्परो मोदवान् ध्रुवपदान्तमीयते ॥११॥
हे ईश! आपके परायण भक्त जन अग्नि वासर शुक्लपक्ष एवं उत्तरायण के अधिष्ठाता
देवताओं के द्वारा सूर्य लोक तक पहुंचाए जाने पर आनन्द पूर्वक ध्रुव लोक को
प्राप्त करते हैं।
आस्थितोऽथ महरालये यदा शेषवक्त्रदहनोष्मणार्द्यते ।
ईयते भवदुपाश्रयस्तदा वेधस: पदमत: पुरैव वा ॥१२॥
तदन्तर महर्लोक में वास करता हुआ जब जीव आदिशेष के मुख से निकली हुई अग्नि की
ऊष्मा से संतप्त होता है, तब आपके शरणागत हो कर, ब्रह्मलोक को पहुंच जाता है।
अथवा वह चाहे तो ऊष्मा से संतप्त होने से पहले ही वह ब्रह्मलोक जा सकता है।
तत्र वा तव पदेऽथवा वसन् प्राकृतप्रलय एति मुक्तताम् ।
स्वेच्छया खलु पुरा विमुच्यते संविभिद्य जगदण्डमोजसा ॥१३॥
ब्रह्मलोक में अथवा आपके लोक - वैकुण्ठलोक में रहते हुए, प्राकृत प्रलय के समय
मुक्त हो जाता है। अथवा निश्चय ही पहले ही, स्वेच्छा से अपनी यौगिक शक्ति से
जगत् ब्रह्माण्ड को भेदता हुआ मुक्त हो जाता है।
तस्य च क्षितिपयोमहोऽनिलद्योमहत्प्रकृतिसप्तकावृती: ।
तत्तदात्मकतया विशन् सुखी याति ते पदमनावृतं विभो ॥१४॥
हे विभो! उस जगत् ब्रह्माण्ड के सात आवरण पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, महत
तत्त्व एवं प्रकृति को उनके अनुकूल स्वरूप को धारण कर के उनमें प्रवेश करता
हुआ सुखानुभूति के साथ आपके अनावृत पद-ब्रह्म पद को चला जाता है।
अर्चिरादिगतिमीदृशीं व्रजन् विच्युतिं न भजते जगत्पते ।
सच्चिदात्मक भवत् गुणोदयानुच्चरन्तमनिलेश पाहि माम् ॥१५॥
हे जगत्पति! इस प्रकार ज्योति आदि गतियों को प्राप्त करके, भक्त, विच्युत हो
कर फिर संसार में नहीं आता। हे सच्चिदानन्दस्वरूप! आपके गुणों की महत्ता का
गान करने वाले मुझ पर कृपा करें। हे अनिलेश! मेरी रक्षा करें।

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