श्रीमन् नारायणीम् *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - १२
स्वायम्भुवो मनुरथो जनसर्गशीलो दृष्ट्वा महीमसमये सलिले निमग्नाम् ।
स्रष्टारमाप शरणं भवदङ्घ्रिसेवा- तुष्टाशयं मुनिजनै: सह सत्यलोके ॥१॥
स्वयंभुव मनु ने जो प्रजा प्रजनन में व्यस्त थे, देखा कि पृथ्वी असमय में जल में निमग्न है। वे अन्य मुनिजनों के साथ ब्रह्माकी शरण में सत्यलोक पहुंचे। उस समय ब्रह्मा का मन आपके चरण कमलों की सेवा करने से सन्तुष्ट था।
कष्टं प्रजा: सृजति मय्यवनिर्निमग्ना स्थानं सरोजभव कल्पय तत् प्रजानाम् ।
इत्येवमेष कथितो मनुना स्वयंभू- रम्भोरुहाक्ष तव पादयुगं व्यचिन्तीत् ॥ २ ॥
स्वायम्भुव मनु ने कहा कि " कष्ट की बात है कि जब मै प्रजा का सृजन कर रहा था, मैने पृथ्वी को जल मग्न देखा। अतएव हे ब्रह्मा! आप प्रजा के लिये स्थान की रचना कीजिये।' हे कमलनयन! मनु के ऐसा कहने पर ब्रह्मा आपके चरण युगल का ध्यान करने लगे।
हा हा विभो जलमहं न्यपिबं पुरस्ता- दद्यापि मज्जति मही किमहं करोमि ।
इत्थं त्वदङ्घ्रियुगलं शरणं यतोऽस्य नासापुटात् समभव: शिशुकोलरूपी ।३॥
'हे भगवन! आश्चर्य और दुख की बात है कि मैने पहले भी समस्त जल पी लिया था फिर भी धरा जल मग्न ही है। मैं क्या करूं।' तब आपके चरण द्वय की शरण गये हुए ब्रह्मा के नासापुट से आप वराह शिशु के रूप में प्रकट हुए।
अङ्गुष्ठमात्रवपुरुत्पतित: पुरस्तात् भोयोऽथ कुम्भिसदृश: समजृम्भथास्त्वम् ।
अभ्रे तथाविधमुदीक्ष्य भवन्तमुच्चै - र्विस्मेरतां विधिरगात् सह सूनुभि: स्वै: ॥४॥
पहले आप अङ्गुष्ठ मात्र परिमाण में उत्पन्न हुए, फिर हाथी के समान बढ गये। आपको इस प्रकार देख कर आकाश में स्थित ब्रह्मा अपने पुत्रों (मरीचि आदि) के सङ्ग अत्यन्त विस्मित हो गये।
कोऽसावचिन्त्यमहिमा किटिरुत्थितो मे नासापुटात् किमु भवेदजितस्य माया ।
इत्थं विचिन्तयति धातरि शैलमात्र: सद्यो भवन् किल जगर्जिथ घोरघोरम् ॥५॥
ब्रह्मा आश्चर्य चकित हो कर विचार करने लगे कि वह अवर्णनीय महिमा वाला सूकर कौन था जो उनके नासिका पुट से निकल आया था, और क्या यह भगवान की माया थी। उसी समय तुरन्त आप पर्वताकार हो कर भयंकर गर्जना करने लगे।
तं ते निनादमुपकर्ण्य जनस्तप:स्था: सत्यस्थिताश्च मुनयो नुनुवुर्भवन्तम् ।
तत्स्तोत्रहर्षुलमना: परिणद्य भूय- स्तोयाशयं विपुलमूर्तिरवातरस्त्वम् ॥६॥
आपके उस भयंकर गर्जन को सुन कर जनलोक, तप:लोक एवं सत्य लोक में स्थित मुनिजन आपका स्तवन करने लगे। स्तवन से प्रसन्न हो कर आप फिर भीषण गर्जना करते हुए विशाल रूप हो कर प्रलय जलाब्धि में उतर गये।
ऊर्ध्वप्रसारिपरिधूम्रविधूतरोमा प्रोत्क्षिप्तवालधिरवाङ्मुखघोरघोण: ।
तूर्णप्रदीर्णजलद: परिघूर्णदक्ष्णा स्तोतृन् मुनीन् शिशिरयन्नवतेरिथ त्वम् ॥७॥
उस समय आपका स्वरूप इस प्रकार था - काले और लोहित रोम ऊपर की ओर उठे हुए थे, और पूंछ भी ऊपर की ओर उठी हुई थी, भयंकर नथुने नीचे की ओर झुके हुए थे और अनायास ही बादलों को छिन्न भिन्न कर देने वाले नेत्र चारो ओर घूम रहे थे। आपके इस स्वरूप को देख कर स्तुति करते हुए मुनिजन को रोमञ्चित करते हुए आप कूद पडे।
अन्तर्जलं तदनुसंकुलनक्रचक्रं भ्राम्यत्तिमिङ्गिलकुलं कलुषोर्मिमालम् ।
आविश्य भीषणरवेण रसातलस्था - नाकम्पयन् वसुमतीमगवेषयस्त्वम् ॥८॥
तब फिर उस जल में जिसके भीतर ग्राह के समूह स्थित थे और तिमिङ्गल मत्स्य के कुल इधर उधर घूम रहे थे, आप भयंकर शब्द करते हुए प्रवेश कर गये। इससे वह जल धूमिल हो गया, और आप रसातल में स्थित जन्तुओं को कम्पायमान करते हुए पृथ्वी को खोजने लगे।
दृष्ट्वाऽथ दैत्यहतकेन रसातलान्ते संवेशितां झटिति कूटकिटिर्विभो त्वम् ।
आपातुकानविगणय्य सुरारिखेटान् दंष्ट्राङ्कुरेण वसुधामदधा: सलीलम् ॥९॥
तब आपने देखा कि दुष्ट असुरों के द्वारा पृथ्वी रसातल के अन्त में छुपाई हुई है। हे भगवन! मायावी सूकर स्वरूप आपने शीघ्र ही आक्रमक नीच असुरों की अवहेलना करते हुए, पृथ्वी को दांत की नोक पर उठा लिया।
अभ्युद्धरन्नथ धरां दशनाग्रलग्न मुस्ताङ्कुराङ्कित इवाधिकपीवरात्मा ।
उद्धूतघोरसलिलाज्जलधेरुदञ्चन्क्रीडावराहवपुरीश्वर पाहि रोगात् ॥१०॥
हे ईश्वर! आप फिर उस समुद्र के घोर जलों से पृथ्वी का उद्धार करते हुए बाहर निकले। पृथ्वी आपके दंष्टाग्र पर वैसे ही शोभायमान हो रही थी जैसे सामान्य सूकर के दंष्टाग्र पर मुस्त नामक दूर्वा शोभायमान होती है। हे लीला सूकर शरीर धारी ईश्वर! रोगों से मेरी रक्षा करें।

No comments:
Post a Comment