Friday, September 21, 2012

श्रीमन् नारायणीम् - दशक ३


श्रीमन् नारायणीम् (श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक ३


पठन्तो नामानि प्रमदभरसिन्धौ निपतिता:
स्मरन्तो रूपं ते वरद कथयन्तो गुणकथा: ।
चरन्तो ये भक्तास्त्वयि खलु रमन्ते परममू-
नहं धन्यान् मन्ये समधिगतसर्वाभिलषितान् ॥१॥
 


:: हे वरद! जो भक्त आपके नामॊं का कीर्तन करते हुए आनन्द के सिन्धु में डूब जाते
हैं, आपके स्वरूप का निरन्तर स्मरण करते हैं, आपके गुणगणों की कथाएं परस्पर
कहते हुए विचरण करते रहते हैं, और आप ही में रमण करते हैं, ऐसे उन भक्तों को
मैं अत्यन्त धन्य मानता हूं, क्योंकि उन्हे सभी अभिलाषाएं प्राप्त हो गई हैं।  

 

गदक्लिष्टं कष्टं तव चरणसेवारसभरेऽ-
प्यनासक्तं चित्तं भवति बत विष्णो कुरु दयाम् ।
भवत्पादाम्भोजस्मरणरसिको नामनिवहा-
नहं गायं गायं कुहचन विवत्स्यामि विजने ॥२॥
 


:: खेद है कि व्याधियों से संतप्त यह चित्त, आपके चरण कमलों की सेवा के रस आनन्द
में अनासक्त है। यह बडे दु:ख की बात है। हे विष्णु! अब आप ही दया कीजिए ताकि,
आपके चरण कमलो के स्मरण का रसिक हो कर, मैं आपके अगणित नामों का संकीर्तन करता
हुआ किसी निर्जन स्थान में निवास कर सकूं।

 

कृपा ते जाता चेत्किमिव न हि लभ्यं तनुभृतां
मदीयक्लेशौघप्रशमनदशा नाम कियती ।
न के के लोकेऽस्मिन्ननिशमयि शोकाभिरहिता
भवद्भक्ता मुक्ता: सुखगतिमसक्ता विदधते ॥३॥
 


:: अहो! यदि आपकी कृपा हो जाये, तो कौन सी वस्तु देहधारियों के लिये अलभ्य है?
फिर मेरे कष्टों के समूह के उन्मूलन की स्थिति तो नाम मात्र है । इस लोक में,
आपके कौन से भक्त हैं जो शोक से रहित हो कर मुक्त भाव से सुख नहीं भोगते और
असक्त भाव से विचरण नहीं करते?

 

 

मुनिप्रौढा रूढा जगति खलु गूढात्मगतयो
भवत्पादाम्भोजस्मरणविरुजो नारदमुखा: ।
चरन्तीश स्वैरं सततपरिनिर्भातपरचि -
त्सदानन्दाद्वैतप्रसरपरिमग्ना: किमपरम् ॥४॥
 


:: हे ईश ! नारद आदि मुनिवर नेता आपके चरण कमलो का निरन्तर ध्यान करते हुए जग मे प्रसिद्धि पाते हैं और स्वयं गूढ गति को प्राप्त करते हैं। वे परम सच्चिदानन्द
अद्वैत के रस में सदा निमग्न रहते हैं और स्वेच्छा से विचरण करते हैं । इससे उच्चतर स्थिति और क्या हो सकती है?

 

 

भवद्भक्ति: स्फीता भवतु मम सैव प्रशमये-
दशेषक्लेशौघं न खलु हृदि सन्देहकणिका ।
न चेद्व्यासस्योक्तिस्तव च वचनं नैगमवचो
भवेन्मिथ्या रथ्यापुरुषवचनप्रायमखिलम् ॥५॥
 


:: आपकी भक्ति मुझमें बढती रहे। वही मेरे समस्त क्लेशों का विनाश कर सकती है।
मेरे हृदय मे अणुमात्र भी सन्देह नहीं है, अन्यथा व्यास जी का कथन, आपके वचन
एवं वेद वाक्य, सब के सब मिथ्या सिद्ध हो जाएंगे, रास्ते के पुरुषों के प्रलाप
के समान।

 

 

भवद्भक्तिस्तावत् प्रमुखमधुरा त्वत् गुणरसात्
किमप्यारूढा चेदखिलपरितापप्रशमनी ।
पुनश्चान्ते स्वान्ते विमलपरिबोधोदयमिल-
न्महानन्दाद्वैतं दिशति किमत: प्रार्थ्यमपरम् ॥६॥
 


::हे ईश! आपकी भक्ति प्रारम्भ से ही मधुर है। आपके असंख्य गुणों के गान से यदि
और बढ जाए तो सम्पूर्ण कष्टों का समूल नाश करने वाली है। और जब अन्त:करण में
निर्मल ज्ञान के जागता है तब अद्वैत का महान आनन्द आपकी भक्ति ही प्रदान करती
है। इससे बढ कर और क्या प्रार्थनीय है?

 

 

विधूय क्लेशान्मे कुरु चरणयुग्मं धृतरसं
भवत्क्षेत्रप्राप्तौ करमपि च ते पूजनविधौ ।
भवन्मूर्त्यालोके नयनमथ ते पादतुलसी-
परिघ्राणे घ्राणं श्रवणमपि ते चारुचरिते ॥७॥
 

 


:: हे ईश! मेरे समस्त क्लेषों को समाप्त कर के, ऐसी कृपा कीजिये कि मेरे दो पग
आपके तीर्थ क्षेत्रों में पहुंचने के रस में आसक्त हों। मेरे हाथ आपकी पूजा
करने की विधि में, नेत्र आपकी प्रतिमा के दर्शन में, नासिका आपके चरणों मे
अर्पित तुलसिका को सूंघने में, और कान भी आपके सुन्दर चरित को सुनने का
रसास्वादन करें।

 

प्रभूताधिव्याधिप्रसभचलिते मामकहृदि
त्वदीयं तद्रूपं परमसुखचिद्रूपमुदियात् ।
उदञ्चद्रोमाञ्चो गलितबहुहर्षाश्रुनिवहो
यथा विस्मर्यासं दुरुपशमपीडापरिभवान् ॥८॥
 


:: हे ईश! मेरा चित्त असंख्य आधि और व्याधियों से अत्यन्त विचलित है। मेरे ऐसे
क्लान्त हृदय में आपका परमानन्द मय ज्ञानस्वरूप रूप उदित हो जाये, जिससे शरीर
पुलकित और रोमाञ्चित हो, और अत्यधिक हर्षातिरेक से अश्रुओं का झरना बह निकले, और मैं अनायास ही दुर्दमनीय पीडाओं के आतंक को भूल जाऊं।

 

मरुद्गेहाधीश त्वयि खलु पराञ्चोऽपि सुखिनो
भवत्स्नेही सोऽहं सुबहु परितप्ये च किमिदम् ।
अकीर्तिस्ते मा भूद्वरद गदभारं प्रशमयन्
भवत् भक्तोत्तंसं झटिति कुरु मां कंसदमन ॥९॥
 


:: हे मरुद्गेहाधिपति! आपमे अनासक्त नास्तिक लोग भी सुखी हैं, किन्तु आपमें स्नेह
रखने वाला मैं बहुत ही परितप्त हूं। यह क्या? हे वरद! आपकी अकीर्ति न हो। हे!
कंसदमन! मेरे कष्टों के भार का प्रशमन करके मुझे शीघ्र ही अपने भक्तों में
श्रेष्ठतम स्थान प्रदान कीजिए।

 

किमुक्तैर्भूयोभिस्तव हि करुणा यावदुदिया-
दहं तावद्देव प्रहितविविधार्तप्रलपितः ।
पुरः क्लृप्ते पादे वरद तव नेष्यामि दिवसा-
न्यथाशक्ति व्यक्तं नतिनुतिनिषेवा विरचयन् ॥१०॥
 


:: हे ईश! बार बार बोलने से क्या लाभ? जब तक आपकी करुणा का उदय नहीं होता, तब तक,
मैं, हे देव! नाना प्रकार के आर्त प्रलापों का परित्याग करके, पहले संकल्प
किये हुए के अनुसार आपके चरणो में नमस्कार स्तुति एवं सेवा करता हुआ दिनों को
व्यतीत करुंगा।


ॐ नमो नारायणाय नम:

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