श्रीमन् नारायणीम् (श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) - दशक १
सान्द्रानन्दावबोधात्मकमनुपमितं कालदेशावधिभ्यां
निर्मुक्तं नित्यमुक्तं निगमशतसहस्रेण निर्भास्यमानम् ।
अस्पष्टं दृष्टमात्रे पुनरुरुपुरुषार्थात्मकं ब्रह्म तत्वं
तत्तावद्भाति साक्षाद् गुरुपवनपुरे हन्त भाग्यं जनानाम् ॥ १ ॥
:: वह महा सत्य, वह ब्रह्म तत्त्व, जो घनीभूत आनन्दमय है, जो ज्ञान स्वरूप है, जो काल और स्थान की सीमा से पूर्ण रूप से और सदा मुक्त है, जिसे सैंकडों सहस्रों वाक्य प्रकाशित करने की चेष्टा करते हैं, फिर भी जो अस्पष्ट है, किन्तु फिर दर्शन करने मात्र से जो महान पुरुषार्थ (मोक्ष) रूप हो जाता है, ऐसा जो ब्रह्म तत्त्व है, वही यहां गुरूवायुर में साक्षात कृश्ण प्रतिमा रूप से प्रकाशित हो रहा है। अहो! यह जन समुदाय के लिये कितने बडे सौभाग्य की बात है।
एवंदुर्लभ्यवस्तुन्यपि सुलभतया हस्तलब्धे यदन्यत्
तन्वा वाचा धिया वा भजति बत जन: क्षुद्रतैव स्फुटेयम् ।
एते तावद्वयं तु स्थिरतरमनसा विश्वपीड़ापहत्यै
निश्शेषात्मानमेनं गुरुपवनपुराधीशमेवाश्रयाम: ॥ २ ॥
:: ऐसी दुर्लभ वस्तु भी जब इतनी सरलता से हाथ मे आ गई हो, फिर भी यदि व्यक्ति अपने शरीर वाणी अथवा बुद्धि से अन्य सांसारिक वस्तुओं का सेवन करता है तो, यह स्पष्ट रूप से निश्चय ही उसकी क्षुद्रता है। किन्तु हम यहां समस्त भक्त जन, निश्चल मन से, स्मस्त पीडाओं के नाश के लिये, इन गुरूपवनपुर के स्वामी, भगवान गुरुवायुर का ही आश्रय लेते हैं।
सत्त्वं यत्तत् पराभ्यामपरिकलनतो निर्मलं तेन तावत्
भूतैर्भूतेन्द्रियैस्ते वपुरिति बहुश: श्रूयते व्यासवाक्यम्।
तत् स्वच्छ्त्वाद्यदाच्छादितपरसुखचि
तस्मिन् धन्या रमन्ते श्रुतिमतिमधुरे सुग्रहे विग्रहे ते ॥ ३ ॥
:: वह सत्व गुण, अन्य दो गुणों- रजो गुण एवं तमो गुण की अपेक्षा परम शुद्ध है एवं उन दोनों के मिश्रण से रहित है। उसी सत्व के उपादन द्वारा सात्विक भूतों एवं इन्द्रियों सहित आपका स्वेच्छामय लीला शरीर निर्मित हुआ है। यह तथ्य बारंबार व्यास जी ने पुराणो में कहा है और वही सुनने में आता है। आपके उस सदाभासित निर्मल विग्रह में परमानन्द चिन्मय ब्रह्म समाविष्ट है। सौभाग्यशाली पुण्यवान भक्त जन, मर भाव से श्रवण एवं मनन करने योग्य, सकल इन्द्रियाह्लादक आपके श्रीविग्रह में सुगमता से रमण करते हैं।
निष्कम्पे नित्यपूर्णे निरवधिपरमानन्दपीयूषरूपे
निर्लीनानेकमुक्तावलिसुभगतमे निर्मलब्रह्मसिन्धौ ।
कल्लोलोल्लासतुल्यं खलु विमलतरं सत्त्वमाहुस्तदात्मा
कस्मान्नो निष्कलस्त्वं सकल इति वचस्त्वत्कलास्वेव भूमन् ॥ ४ ॥
:: हे भूमन ! आप परम शुद्ध ब्रह्म महान समुद्र के समान अपरिवर्तनशील, सदा परिपूर्ण एवं असीम परमानन्द स्वरूप हैं। अनेक मोतियों कि मालाएं जिस प्रकार समुद्र की शोभा बढाती हैं उसी प्रकार अनेक मुक्त आत्माएं ब्राह्मिक आनन्द सागर मे रमती हैं और उसकी शोभा बढाती हैं। जिस प्रकार समुद्र में उत्ताल तरङ्गे उठ्ती हैं, उसी प्रकार निर्मल सत्त्व का उद्रेक भी आपसे ही है। आप को निश्कल (कला रहित, पूर्णावतार) क्यों न कहा जाय, क्योंकि आपको सकल (कला युक्त) यह कहना तो आपकी कलाओं (अंशावतारों) के लिये संगत होता है।
निर्व्यापारोऽपि निष्कारणमज भजसे यत्क्रियामीक्षणाख्यां
तेनैवोदेति लीना प्रकृतिरसतिकल्पाऽपि कल्पादिकाले।
तस्या: संशुद्धमंशं कमपि तमतिरोधायकं सत्त्वरूपं
स त्वं धृत्वा दधासि स्वमहिमविभवाकुण्ठ वैकुण्ठ रूपं॥५॥
:: हे अज ! कर्मों से अबाधित और निष्प्रयोजन होते हुए भी आप ईक्षणा (प्रक्रिया की इच्छा) नाम वाली क्रिया को स्वीकारते हैं। उसी के कारण उस 'प्रकृति' का प्रादुर्भाव होता है, जो कल्प के प्रारम्भ में, आप में समाहित् प्रकृति अविद्यमान हो कर भी समाहित रहती है। उसी के परम संशुद्ध, तिरोधान रहित अंश को धारण करके आप अपने महिमापूर्ण वैभव से अकुण्ठित वैकुण्ठ रूप को धारण करते हैं।
तत्ते प्रत्यग्रधाराधरललितकलायावलीके
लावण्यस्यैकसारं सुकृतिजनदृशां पूर्णपुण्यावतारम्।
लक्ष्मीनिश्शङ्कलीलानिलयनममृतस्
सिञ्चत् सञ्चिन्तकानां वपुरनुकलये मारुतागारनाथ ॥६॥
:: आपका वह स्वरूप जो नवीन सजल जलधर के समान श्याम वर्ण का है, और जो कोमल कलायपुष्पों के समूह के समान सौन्दर्य का एक मात्र सार स्वरूप है, सुकृति जनो के पुण्यों का मानो पूर्ण अवतार है। आपका वह स्वरूप लक्ष्मी की नि:शंक लीला स्थली है, अमृत के निर्झर का उद्गम है एवं ध्यानावस्थित जनों के अन्त:स्थल को आनन्द रस से सिञ्चित करने वाला है। हे गुरुवायुर के स्वामी! ऐसे आपके श्रीविग्रह का मैं सतत ध्यान करता हूं।
कष्टा ते सृष्टिचेष्टा बहुतरभवखेदावहा जीवभाजा-
मित्येवं पूर्वमालोचितमजित मया नैवमद्याभिजाने।
नोचेज्जीवा: कथं वा मधुरतरमिदं त्वद्वपुश्चिद्रसार्द्रं
नेत्रै: श्रोत्रैश्च पीत्वा परमरससुधाम्भोधिपूरे रमेरन्॥७॥
:: हे अजित! आपकी सृजनात्मक चेष्टा शरीर धारी जीवों के लिये कष्टदायिनी है। पहले मेरा यही तर्क था। किन्तु अब मैं ऐसा नहीं सोचता। क्योंकि यदि आप जीवों की और इस प्रपञ्चमय संसार की रचना नहीं करते, तो शरीरधारी जीव आपके इस अत्यन्त मधुर् चिदानन्द रस से परिपूर्ण श्रीविग्रह का नेत्रों (दर्शन) एवं कानों से (कथा श्रवण) पान करके परमानन्दामृत रस सागर में कैसे रमण करते।
नम्राणां सन्निधत्ते सततमपि पुरस्तैरनभ्यर्थितान -
प्यर्थान् कामानजस्रं वितरति परमानन्दसान्द्रां गतिं च।
इत्थं निश्शेषलभ्यो निरवधिकफल: पारिजातो हरे त्वं
क्षुद्रं तं शक्रवाटीद्रुममभिलषति व्यर्थमर्थिव्रजोऽयम्॥८॥
:: हे हरि ! आपको भक्तिपूर्वक नमन करने वालों के समक्ष आप सदा प्रकट रहते हैं। उनके द्वारा अप्रार्थित अनेक अर्थो एवं कामनाओं को भी आप प्रदान करते हैं। यहां तक कि परमानन्दघन मुक्ति भी प्रदान कर देते हैं। इस प्रकार आप जीवमात्र के लिये लभ्य हैं और अनन्त वरो के दाता भी हैं। आप साक्षात पारिजात तरु हैं। फिर भी यह याचक गण इन्द्र के उद्यान के उस क्षुद्र कल्पक वृक्ष की निरर्थक कामना करते हैं, जो मात्र तुच्छ इच्छाओं का पूरक है।
कारुण्यात्काममन्यं ददति खलु परे स्वात्मदस्त्वं विशेषा-
दैश्वर्यादीशतेऽन्ये जगति परजने स्वात्मनोऽपीश्वरस्त्वम्।
त्वय्युच्चैरारमन्ति प्रतिपदमधुरे चेतना: स्फीतभाग्या-
स्त्वं चात्माराम एवेत्यतुलगुणगणाधार शौरे नमस्ते॥९॥
:: ब्रह्मा आदि अन्य देवता करुणावश अपने भक्तों को इच्छित वर देते हैं. किन्तु आप तो, अपने भक्तों को, करुणा से अभिभूत हो कर स्वयं को ही दे देते हैं, अर्थात मोक्ष तक दे देते हैं। जगत मैं ब्रह्मा आदि देव अपने ऐश्वर्य से जीवों पर अनुग्रह करने मैं समर्थ हैं। जबकी आप तो स्वयं के भी और अन्य सभी देवों के भी ईश्वर हैं। अत्यन्त भाग्यशाली ज्ञानी जन आप ही में रमण करते हैं। आप पग पग पर मधुरता से पर्रिपूर्ण है। आप स्वयं तो अपने आप में ही रमण करते हैं। हे अतुलनीय गुणों के आधार! आपको नमस्कार है।
ऐश्वर्यं शङ्करादीश्वरविनियमनं विश्वतेजोहराणां
तेजस्संहारि वीर्यं विमलमपि यशो निस्पृहैश्चोपगीतम्।
अङ्गासङ्गा सदा श्रीरखिलविदसि न क्वापि ते सङ्गवार्ता
तद्वातागारवासिन् मुरहर भगवच्छब्दमुख्याश्रयोऽसि॥१०॥
:: हे गुरुवायुर् के अधिष्ठाता! हे मुरारि! आपका ऐश्वर्य शंकरादि देवों के अधिकारों का नियामक है। विश्व के तेजस्वियों के तेज का संहार करने में समर्थ आपका पराक्रम है। आपका यश निर्मल है और निस्पृह जनों के द्वारा वर्णित है। लक्ष्मी सदा आपके सङ्ग विराजती हैं, फ़िर भी हे सर्वज्ञ ! कहीं भी आपकी आसक्ति की बात सुनने में नहीं आती। इसीलिये 'भगवत्' शब्द के एकमात्र आश्रय आप ही हैं।
ॐ नमो नारायणाय नम:

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