Tuesday, October 2, 2012

श्रीमन् नारायणीम् - दशक - १७







                       श्रीमन् नारायणीम् *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - १७ 

 

उत्तानपादनृपतेर्मनुनन्दनस्य जाया बभूव सुरुचिर्नितरामभीष्टा ।
अन्या सुनीतिरिति भर्तुरनादृता सात्वामेव नित्यमगति: शरणं गताऽभूत् ॥१॥

मनु पुत्र उत्तानपाद की पत्नी सुरुचि उनकी अत्यन्त प्रिया थी। दूसरी पत्नी सुनीति पति से अवहेलित और शरणहीन थी। वह नित्य प्रति आपकी ही शरण में जाती थी, आप जो अशरणों के शरण हैं।


अङ्के पितु: सुरुचिपुत्रकमुत्तमं तं दृष्ट्वा ध्रुव: किल सुनीतिसुतोऽधिरोक्ष्यन् ।
आचिक्षिपे किल शिशु: सुतरां सुरुच्या दुस्सन्त्यजा खलु भवद्विमुखैरसूया ॥२॥

पिता की गोद में सुरुचि के पुत्र उत्तम को देख कर सुनीति के पुत्र ध्रुव ने भी पिता की गोद में चढने का उपक्रम किया। फलस्वरूप उस बालक को सुरुचि ने अत्यधिक कठोरता से डांटा। निश्चय ही, आप से विमुख लोग ईर्ष्या और द्वेष को आसानी से नहीं छोड पाते।


त्वन्मोहिते पितरि पश्यति दारवश्ये दूरं दुरुक्तिनिहत: स गतो निजाम्बाम् ।
साऽपि स्वकर्मगतिसन्तरणाय पुंसां त्वत्पादमेव शरणं शिशवे शशंस ॥३॥

आपकी माया से मोहित होने पर पत्नी के वशीभूत हुए पिता के चुपचाप देखते रह जाने पर कटुवचनों से आहत ध्रुव वहां से हट गया और अपनी माता के पास गया। माता ने भी उस बालक को यही बतलाया कि मनुष्य मात्र को अपने कर्मों की गति को पार करने के लिये, एकमात्र आप ही की शरण में जाना होता है।


आकर्ण्य सोऽपि भवदर्चननिश्चितात्मा मानी निरेत्य नगरात् किल पञ्चवर्ष: । सन्दृष्टनारदनिवेदितमन्त्रमार्ग- स्त्वामारराध तपसा मधुकाननान्ते ॥४॥

यह सुन कर वह पांच वर्षीय स्वाभिमानी बालक आपकी आराधना का मन में दृढ निश्चय कर के नगर से निकल गया। मार्ग में उसकी नारद जी से भेंट हुई और उनसे मन्त्र मार्ग की दीक्षा मिली। फिर वह मधुवन में जा कर आपकी आराधना और तपस्या करने लगा।
 

ताते विषण्णहृदये नगरीं गतेन श्रीनारदेन परिसान्त्वितचित्तवृत्तौ ।
बालस्त्वदर्पितमना: क्रमवर्धितेन निन्ये कठोरतपसा किल पञ्चमासान् ॥५॥

ध्रुव के पिता उत्तानपाद का हृदय अत्यन्त दुखित हो गया। उसी समय नारद जी उनके नगर को गये और उनको सान्त्वना देते हुए शान्त किया। ध्रुव भी एकाग्र चित्त से आपकी आराधना करते रहा और क्रमश: उसकी तपस्या बढती गई। इस प्रकार उसने पांच महीने बिताए।


तावत्तपोबलनिरुच्छ्-वसिते दिगन्ते देवार्थितस्त्वमुदयत्करुणार्द्रचेता: ।
त्वद्रूपचिद्रसनिलीनमते: पुरस्ता- दाविर्बभूविथ विभो गरुडाधिरूढ: ॥६॥

ध्रुव के तप के बल से सभी दिशांओं में श्वासावरोध हो गया। तब देवताओं ने आपसे प्रार्थना की। ध्रुव के तप और देवों की प्रार्थना से करुणा के उदित होने से आपका मन पिघल गया। आपके स्वरूपभूत चिदानन्द रस में निमग्न उस बालक ध्रुव के समक्ष फिर आप गरुड के ऊपर आरूढ हो कर प्रकट हुए।


त्वद्दर्शनप्रमदभारतरङ्गितं तं दृग्भ्यां निमग्नमिव रूपरसायने ते ।
तुष्टूषमाणमवगम्य कपोलदेशे संस्पृष्टवानसि दरेण तथाऽऽदरेण ॥७॥

आपके दर्शन जनित हर्ष के अतिरेक से ध्रुव का तरङ्गित मन आपके स्वरूप के अमृत में डूब गया। वह स्तुति करने का इच्छुक है यह समझ कर आपने उसके गाल पर प्यार से अपना शंख छुआ दिया।


तावद्विबोधविमलं प्रणुवन्तमेन- माभाषथास्त्वमवगम्य तदीयभावम् ।
राज्यं चिरं समनुभूय भजस्व भूय: सर्वोत्तरं ध्रुव पदं विनिवृत्तिहीनम् ॥८॥

तब तक तत्त्व बोध से विमल हुआ ध्रुव आपकी स्तुति करने लगा। उसके मनोभाव को जानते हुए आपने कहा - 'चिरकाल तक राज्य का उपभोग कर लेने के पश्चात तुम सब से ऊपर स्थित ध्रुव पद को प्राप्त करो, जो पुनरावृत्ति रहित लोक है।'


इत्यूचिषि त्वयि गते नृपनन्दनोऽसा- वानन्दिताखिलजनो नगरीमुपेत: ।
रेमे चिरं भवदनुग्रहपूर्णकाम- स्ताते गते च वनमादृतराज्यभार: ॥९॥

सभी लोगों को आनन्दित करता हुआ यह राजकुमार ध्रुव नगर को लौट गया। उसके पिता उसके ऊपर राज्य भार सौंप कर वन को चले गये। आपकी कृपा से पूर्ण काम हुए ध्रुव ने चिरकाल तक राज्य का उपभोग किया।


यक्षेण देव निहते पुनरुत्तमेऽस्मिन् यक्षै: स युद्धनिरतो विरतो मनूक्त्या ।
शान्त्या प्रसन्नहृदयाद्धनदादुपेता- त्त्वद्भक्तिमेव सुदृढामवृणोन्महात्मा ॥१०॥

 यक्ष के द्वारा उत्तम के मारे जाने पर ध्रुव उस यक्ष के साथ युद्ध करने लगे किन्तु फिर मनु के कहने पर युद्ध को रोक भी दिया। ध्रुव के शान्त स्वभाव से प्रसन्न हो कर कुबेर उसके पास पहुंचे। महात्मा ध्रुव ने कुबेर से भी आपमें दृढ भक्ति का ही वरदान मांगा।


अन्ते भवत्पुरुषनीतविमानयातो मात्रा समं ध्रुवपदे मुदितोऽयमास्ते ।
एवं स्वभृत्यजनपालनलोलधीस्त्वं वातालयाधिप निरुन्धि ममामयौघान् ॥११॥

आपके पार्षदों के द्वारा लाये गये विमान पर ध्रुव अपनी माता के संग चले गये। वे ध्रुव पद पर प्रसन्नता पूर्वक विराजमान हैं। इस प्रकार अपने सेवको के पालन में उद्यत हे वातालयाधिप! मेरे कष्ट समूहों का नाश करें।


ॐ नमो नारायणाय नम: ..

 


No comments:

Post a Comment