श्रीमन् नारायणीम् *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - १६
दक्षो विरिञ्चतनयोऽथ मनोस्तनूजां लब्ध्वा प्रसूतिमिह षोडश चाप कन्या: ।
धर्मे त्रयोदश ददौ पितृषु स्वधां च स्वाहां हविर्भुजि सतीं गिरिशे त्वदंशे ॥१॥
तब, ब्रह्मा के पुत्र दक्ष ने मनु की पुत्री प्रसुति को पत्नी के रूप में पा कर, उससे सोलह कन्याएं प्राप्त कीं। उनमें से तेरह कन्याओं को धर्म को दे दिया, पितरों को स्वधा को दे दिया, स्वाहा को अग्नि को और सती को आपके ही अंश शंकर को दे दिया।
मूर्तिर्हि धर्मगृहिणी सुषुवे भवन्तं नारायणं नरसखं महितानुभावम् ।
यज्जन्मनि प्रमुदिता: कृततूर्यघोषा: पुष्पोत्करान् प्रववृषुर्नुनुवु: सुरौघा: ॥२॥
धर्म की पत्नी मूर्ति ने ही अत्यन्त महिमाशाली आप नारायण को नर के साथ जन्म दिया। आपके उस जन्म के समय देव गण हर्षोल्लास सहित दुन्दुभियों का घोष करने लगे, और फूलों के समूहों की वर्षा करते हुए आपका स्तवन करने लगे।
दैत्यं सहस्रकवचं कवचै: परीतं साहस्रवत्सरतपस्समराभिलव्यै: ।
पर्यायनिर्मिततपस्समरौ भवन्तौ शिष्टैककङ्कटममुं न्यहतां सलीलम् ॥३॥
सहस्र कवचमक दैत्य हजारों कवचों से सन्नद्ध था। वे कवच हजारों वर्षों की तपस्या और युद्ध से ही भेदे जा सकते थे। आप दोनों, नर और नारायण ने, बारी बारे से युद्ध और तपस्या कर के उनका भेदन किया। जब मात्र एक कवच बच गया तब आप दोनों ने उसे बिना श्रम के मार डाला।
अन्वाचरन्नुपदिशन्नपि मोक्षधर्मं त्वं भ्रातृमान् बदरिकाश्रममध्यवात्सी: ।
शक्रोऽथ ते शमतपोबलनिस्सहात्मा दिव्याङ्गनापरिवृतं प्रजिघाय मारम् ॥४॥
आप मोक्ष धर्म का अभ्यास करने के साथ साथ उसका उपदेश और प्रचार भी करते हुए अपने भाई नर के साथ बदरिकाश्रम में निवास करने लगे। आपके इन्द्रिय निग्रह और तपोबल को देख कर ईर्ष्यालु इन्द्र ने दिव्याङ्गनाओं से घिरे हुए कामदेव को आपके पास भेजा।
कामो वसन्तमलयानिलबन्धुशाली कान्ताकटाक्षविशिखैर्विकसद्विलासै: । विध्यन्मुहुर्मुहुरकम्पमुदीक्ष्य च त्वां भीरुस्त्वयाऽथ जगदे मृदुहासभाजा ॥५॥
कामदेव अपने बन्धुओं वसन्त और मलय वायु के साथ वहां गये। विलास को बढाने वाले कामिनियॊ के कटाक्षों से उसने आपको बार बार भेदना चाहा। किन्तु आपको अविचलित देख कर वह डर गया। उस डरपोक को आपने मन्द मुस्कान से कहा-
भीत्याऽलमङ्गज वसन्त सुराङ्गना वो मन्मानसं त्विह जुषध्वमिति ब्रुवाण: ।
त्वं विस्मयेन परित: स्तुवतामथैषां प्रादर्शय: स्वपरिचारककातराक्षी: ॥६॥
कामदेव, वसन्त और देवाङ्गनाओं! तुम लोग डरो मत। मेरे पास यहां आकर मेरे मानस का अनुशीलन करो।' आपके इस प्रकार कहने पर वे अत्यन्त विस्मित हो कर आपके निकट जा कर आपकी स्तुति करने लगे। स्तुति करते हुए उनको आपने अपनी सुन्दर नेत्रों वाली परिचारिकाओं को दिखलाया।
सम्मोहनाय मिलिता मदनादयस्ते त्वद्दासिकापरिमलै: किल मोहमापु: ।
दत्तां त्वया च जगृहुस्त्रपयैव सर्व- स्वर्वासिगर्वशमनीं पुनरुर्वशीं ताम् ॥७॥
कामदेव अदि जो मिलकर आपको सम्मोहित करने के लिये आये थे, आपकी परिचारिकाओं की गन्ध से स्वयं ही मुग्ध हो गये। जब आपने स्वर्गवासी सुराङ्गनाओं के गर्व का शमन करने वाली उर्वशी उन्हे प्रदान की तब उन्होंने उसे अत्यन्त लज्जा सहित ग्रहण किया।
दृष्ट्वोर्वशीं तव कथां च निशम्य शक्र: पर्याकुलोऽजनि भवन्महिमावमर्शात् ।
एवं प्रशान्तरमणीयतरावतारा- त्त्वत्तोऽधिको वरद कृष्णतनुस्त्वमेव ॥८॥
उर्वशी को देख कर और आपकी वार्ताएं सुन कर, आपकी महिमा से अज्ञात होने के कारण इन्द्र व्याकुल हो गया। हे वरद! आपके इस अत्यन्त शान्त और रमणीय नर नारायण के अवतार से आपका कृष्ण स्वरूप अवतार ही अधिक महान है।
दक्षस्तु धातुरतिलालनया रजोऽन्धो नात्यादृतस्त्वयि च कष्टमशान्तिरासीत् ।
येन व्यरुन्ध स भवत्तनुमेव शर्वं यज्ञे च वैरपिशुने स्वसुतां व्यमानीत् ॥९॥
ब्रह्मा के अत्यधिक स्नेह से लालित दक्ष रजोगुण जनित राग से अंधे हो गये। वे आपका भी आदर नहीं करते थे। इसी कारण वे अशान्त रहते थे। खेद है कि उन्होंने आपके ही अंश स्वरूप शंकर से यज्ञ में वैर सूचक व्यवहार किया और अपनी ही कन्या का निरादर किया।
क्रुद्धेशमर्दितमख: स तु कृत्तशीर्षो देवप्रसादितहरादथ लब्धजीव: ।
त्वत्पूरितक्रतुवर: पुनराप शान्तिं स त्वं प्रशान्तिकर पाहि मरुत्पुरेश ॥१०॥
शंकर ने क्रोधित हो कर वह यज्ञ नष्ट भ्रष्ट कर दिया और दक्ष का सिर काट दिया। देवों के द्वारा शान्त और प्रसन्न किये जाने पर फिर शंकर ने दक्ष को जीवन दान दिया। आपने फिर उस महान यज्ञ को पूर्ण करवाया। तब कहीं दक्ष को शान्ति मिली। हे प्रशान्तिकर मरुत्पुरेश! वह आप मेरी रक्षा करें।
ॐ नमो नारायणाय नम: ..

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