श्रीमन् नारायणीम् *(श्रीनारायण मेपात्तुर भट्टथिरि कृत) *- दशक - २४
हिरण्याक्षे पोत्रिप्रवरवपुषा देव भवता
हते शोकक्रोधग्लपितधृतिरेतस्य सहज: ।
हिरण्यप्रारम्भ: कशिपुरमरारातिसदसि
प्रतिज्ञमातेने तव किल वधार्थं मधुरिपो ॥१॥
:: अति उत्तम वराह स्वरूप धारण कर के जब आपने हिरण्याक्ष को मार डाला तब उसका भाई हिरण्यकशिपु: शोक और क्रोध से विह्वल हो कर मति खो बैठा। हे मधुरिपु! तब राक्षसों की सभा में, उसने आपको मार डालने की प्रतिज्ञा की।
विधातारं घोरं स खलु तपसित्वा नचिरत:
पुर: साक्षात्कुर्वन् सुरनरमृगाद्यैरनिधनम् ।
वरं लब्ध्वा दृप्तो जगदिह भवन्नायकमिदं
रिक्षुन्दन्निन्द्रादहरत दिवं त्वामगणयन् ॥२॥
:: उसने निश्चय ही घोर तपस्या कर के शीघ्र ही ब्रह्मा जी को अपने सामने उपस्थित कर लिया। देव मनुष्य अथवा पशु किसी के भी द्वारा न मारे जाने का वर प्राप्त कर के वह गर्वित हो उठा। इस जगत के नियन्ता आप की अवहेलना करते हुए उसने इस जगत को पीडित कर दिया और इन्द्र से उसका देवलोक छीन लिया।
निहन्तुं त्वां भूयस्तव पदमवाप्तस्य च रिपो-
र्बहिर्दृष्टेरन्तर्दधिथ हृदये सूक्ष्मवपुषा ।
नदन्नुच्चैस्तत्राप्यखिलभुवनान्ते च मृगयन्
भिया यातं मत्वा स खलु जितकाशी निववृते ॥३॥
:: आपको मारने के लिये वह आपके निवास स्थान वैकुण्ठ को पहुंच गया। आप अपने शत्रु के देह चक्षुओं से ओझल हो कर सूक्ष्म रूप से उसके हृदय में प्रवेश कर गये। तीव्र चीत्कार के साथ वह आपको भुवनों के अन्त तक खोजता रहा। फिर आपको डर से भागा हुआ और स्वयं को विजयी मान कर वह लौट गया।
ततोऽस्य प्रह्लाद: समजनि सुतो गर्भवसतौ
मुनेर्वीणापाणेरधिगतभवद्भक्ति महिमा ।
स वै जात्या दैत्य: शिशुरपि समेत्य त्वयि रतिं
गतस्त्वद्भक्तानां वरद परमोदाहरणताम् ॥४॥
:: तदनन्तर, उसके प्रह्लाद नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। उसने गर्भ में रहते हुए ही वीणा पाणि नारद जी से आपकी भक्ति की महिमा का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। हे वरद! दैत्य वंश का होते हुए भी, बाल काल में ही आपका प्रेमी हो कर, वह आपके भक्तों में परम भक्त का उदाहरण बन गया।
सुरारीणां हास्यं तव चरणदास्यं निजसुते
स दृष्ट्वा दुष्टात्मा गुरुभिरशिशिक्षच्चिरममुम् ।
गुरुप्रोक्तं चासाविदमिदमभद्राय दृढमि-
त्यपाकुर्वन् सर्वं तव चरणभक्त्यैव ववृधे ॥ ५ ॥
:: असुरों के लिये हास्यास्पद आपके चरणो की दासता को अपने पुत्र में देख कर, उस दुष्टात्मा हिरण्यकशिपु ने गुरुओं के द्वारा प्रह्लाद को बहुत समय तक शिक्षा दिलवाई। गुरुओं के द्वारा दिया गया सारा ज्ञान अकल्याण्कारी है, ऐसा निश्चय करके उन सब का त्याग कर के वह आपके चरणों की भक्ति के साथ बढता रहा।
अधीतेषु श्रेष्ठं किमिति परिपृष्टेऽथ तनये
भवद्भक्तिं वर्यामभिगदति पर्याकुलधृति: ।
गुरुभ्यो रोषित्वा सहजमतिरस्येत्यभिविदन्
वधोपायानस्मिन् व्यतनुत भवत्पादशरणे ॥६॥
:: 'पढे हुए पाठ में श्रेष्ठ क्या है' ऐसा पूछे जाने पर प्रह्लाद ने आपकी भक्ति को ही सर्वोत्तम बताया। इससे विचलित बुद्धि हिरण्यकशिपु गुरुओं पर बहुत क्रोधित हुआ। गुरुओं से यह जान कर कि यह प्रह्लाद का सहज स्वभाव है, वह आपके चरणों की शरण में आए प्रह्लाद पर उसके वध के उपायों का, प्रयोग करने लगा।
स शूलैराविद्ध: सुबहु मथितो दिग्गजगणै-
र्महासर्पैर्दष्टोऽप्यनशनगराहारविधुत: ।
गिरीन्द्रवक्षिप्तोऽप्यहह! परमात्मन्नयि विभो
त्वयि न्यस्तात्मत्वात् किमपि न निपीडामभजत ॥७॥
:: प्रह्लाद को अनेक बार शूलों से बिंधवाया गया, विशाल हाथियों से मर्दित करवाया गया, बडे बडे सर्पों से दंशित करवाया गया, निराहा रखा गया, विषाक्त भोजन करवाया गया, गिरीन्द्रों के ऊपर से गिरवाया गया। हे विश्वव्यापक प्रभु! आश्चर्य है कि आपमें मन को स्थिर कर लेने के कारण उसने थोडी सी भी पीडा का अनुभव नहीं किया।
तत: शङ्काविष्ट: स पुनरतिदुष्टोऽस्य जनको
गुरूक्त्या तद्गेहे किल वरुणपाशैस्तमरुणत् ।
गुरोश्चासान्निध्ये स पुनरनुगान् दैत्यतनयान्
भवद्भक्तेस्तत्त्वं परममपि विज्ञानमशिषत् ॥८॥
:: तब, उसके सशंक और अति दुष्ट पिता ने, गुरु के कहने पर, गुरु के ही घर पर, उसे वरुण पाशों से बंधवा दिया। वहां, जब भी गुरु समीप नहीं होते थे, तब प्रह्लाद अपने संगी दैत्य पुत्रों को आपकी भक्ति की महिमा और उत्तम ब्रह्म ज्ञान की शिक्षा देता था।
पिता शृण्वन् बालप्रकरमखिलं त्वत्स्तुतिपरं
रुषान्ध: प्राहैनं कुलहतक कस्ते बलमिति ।
बलं मे वैकुण्ठस्तव च जगतां चापि स बलं
स एव त्रैलोक्यं सकलमिति धीरोऽयमगदीत् ॥९॥
:: पिता ने जब सुना कि पूरा बाल समूह आपकी स्तुति करने में लीन है, तब क्रोध से अन्धे हो कर उसने प्रह्लाद को कहा, 'कुल द्रोही! तेरा बल क्या है?' इस पर धीर और निडर प्रह्लाद ने कहा, 'मेरे बल विष्णु है, और आपके भी, और सारे जगत के भी। वे ही त्रिलोक स्वरूप हैं।'
अरे क्वासौ क्वासौ सकलजगदात्मा हरिरिति
प्रभिन्ते स्म स्तंभं चलितकरवालो दितिसुत: ।
अत: पश्चाद्विष्णो न हि वदितुमीशोऽस्मि सहसा
कृपात्मन् विश्वात्मन् पवनपुरवासिन् मृडय माम् ॥१०॥
:: 'अरे कहां है, कहां है यह सारे जगत का आत्म स्वरूप" इस प्रकार कहते हुए जब दिति के पुत्र हिरण्यकशिपु ने तलवार चला कर स्तम्भ पर प्रहार किया, तब इसके पश्चात जो हुआ, हे विष्णु! हे ईश्वर! मैं सहसा बोल सकने में समर्थ नहीं हूं। हे कृपात्मन! हे विश्वात्मन! हे पवनपुरवासिन! मुझे परिपूरित कीजिये।
ॐ नमो नारायणाय नम: ..

No comments:
Post a Comment